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(i) ऐसे विषय (मामले) हैं जिनके लिए प्रमाण की अपेक्षा नहीं की जाती है।
(ii) ऐसे विषय हैं जिनके लिए प्रमाण देने को नहीं कहा जाता है।
- अतः हमको इन मामलों और उनको विनियमित करने वाले नियमों पर विचार
करने के लिए कार्यवाही अवश्य करनी चाहिए।
1. प्रमाण का भार
(i) विषय जिनके लिए प्रमाण की अपेक्षा नहीं की जाती है तथ्य जिनके लिए प्रमाण की अपेक्षा नहीं की जाती।
- विषय जिनके लिए प्रमाण की अपेक्षा नहीं की जाती है तीन शीर्षकों के
अधीन होते हैंः
(1) न्यायिकतः अधिसूचित तथ्य
(2) पक्षों द्वारा स्वीकृत तथ्य
(3) तथ्य जिनका अस्तित्व विधि द्वारा मान लिया जाता है।
(i) न्यायिकतः अधिसूचित तथ्य
- धारा 56 एवं 57 न्यायिकतः अधिसूचित तथ्यों के साथ व्यवहार करती
हैं।
- धारा 56 व्यक्त करती है कि कोई भी तथ्य जिसके लिए न्यायालय न्यायिक
अधिसूचना लेता है उसे प्रमाणित किए जाने की आवश्यकता नहीं है।
- धारा 57 तेरह विषयों को निर्धारित करती है, जिनके लिए न्यायालय को
न्यायिक सूचना की जरूरत है।
- धारा के सिद्धांत
कतिपय विषय ऐसे कुख्यात हैं और इतने स्पष्टतः प्रतिष्ठित हैं कि यह आग्रह करना व्यर्थ होगा कि वे साक्ष्य द्वारा प्रमाणित होने चाहिए।
दृष्टांतः-
(1) प्रतिकूल स्थिति का आरंभ और निरंतरता।
(2) भौगोलिक विभाजन।
- अंतिम दो पैरा महत्त्वपूर्ण हैं और धारा 56 के साथ पढ़े जाते हैं। वे उनको ठीक समझने के लिए सूत्र प्रस्तुत करते हैं। प्रभाव यह है कि जब एक विषय धारा 57 की गणना में प्रश्न के रूप में आता है तो, पक्ष जो उसके अस्त्तिव को प्रतिकूल कहते हैं उन्हें अपने कथन के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करने की कोई आवश्यकता नहीं। न्यायाधीश को बिना किसी औपचारिक साक्ष्य की अपेक्षा किए, एक परिणाम पर अवश्य पहुंचना