160 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
चाहिए।
(1) न्यायाधीश का अपना ज्ञान पर्याप्त हो सकता है। यदि उसे ज्ञान नहीं है, तो
उसे अवश्य मामले की खोजबीन करनी चाहिए।
(2) न्यायाधीश अपनी सहायता के लिए पक्षों के भी पास जा सकता है, यदि वह
आवश्यक समझता है।
(3) न्यायाधीश इस अनुसंधान के करने में, तथ्यों, जिनको प्रमाणित करने की एक
व्यक्ति से विधि अपेक्षा करती है, के अनुसंधान के लिए निर्धारित साक्ष्य के
सभी नियमों से, पूर्णतः मुक्त होता है।
II. पक्षों द्वारा स्वीकृत तथ्य
धारा 58
- दो प्रकार की स्वीकृतियां हैं जो अवश्य प्रभेदित होनी चाहिए। (1) एक न्यायालय की कार्यवाही से संबंधित विषयों से संबंध रखने वाली
औपचारिक स्वीकृतियां जो जानबूझ कर पक्षों द्वारा अपने प्रमाण को छोड़ देने
के लिए की गई हों।
(2) एक पक्ष द्वारा तथाकथित की जाने वाली अनौपचारिक स्वीकृति लेकिन वह
कार्यवाही के क्रम में नहीं होनी चाहिए।
धारा 58 केवल औपचारिक स्वीकृतियों के प्रति होती हैं।
औपचारिक स्वीकृतियां, पक्षों के द्वारा 6 विभिन्न रूपों से की जा सकती हैंः (i) वकालत पर
(ii) परिप्रश्नों के उत्तर में
(iii) एक सूचना (नोटिस) में उल्लिखित तथ्यों की स्वीकृति के उत्तर में। (iv) प्रलेखों को प्रस्तुत करने और स्वीकार करने के उत्तर में।
(v) मुकदमेबाजी के दौरान एक पक्ष के सॉलीसिटर द्वारा।
(vi) प्रत्यक्ष न्यायालय में स्वयं वादार्थी द्वारा या उसके अधिवक्ता द्वारा। 3. इस प्रकार के तथ्यों का प्रमाण व्यर्थ न होगा। न्यायालय को उन्हीं प्रश्नों का
अन्वीक्षण (विचार) करना है, जिन पर पक्ष विवाद्यक हैं, उन पर नहीं जिन
पर वे सहमत हैं।
- दंड अन्वीक्षण में धारा 58 की प्रयुक्तता एक विषय है जिस पर अलग-अलग
मत हैं।
(i) नॉशन कहते हैं कि यह दंड अन्वीक्षणों में प्रयुक्त नहीं होता है।