भाग -3 प्रमाण का भार - Page 184

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(1) यह कि उपेंद्र फोड़े, जिससे वह 14 दिन से पीडि़त था, के प्रभाव से मरा।

(2) यह कि उपेंद्र ने 14 जुलाई, 1886 को एक वसीयत तिलोत्तमा को अपनी निष्पादिका के रूप में नियुक्त करते हुए और उसे एक बच्चा गोद लेने का निर्देशन देते हुए लिखी।

प्रतिवाद था कि यदि वह बीमार था तो वह समागम नहीं कर सका था। विवाद नकारात्मक था।

(3) समागम की अक्षमता प्रजननीय अक्षमता से भिन्न होनी चाहिए। 1935 (अखिल भारतीय प्रतिवेदक) पी.ओ. 199 (शारीरिक अक्षमता के लिए)।

प्रश्न-यदि वह नपुंसक था।

धारा, हिन्दू और मुस्लिम विधि के नियम की वैधता के संबंध का निराकरण

करती है। 10 इलाहाबाद, 289

  1. मुस्लिम-विधि के अनुसार शादी के छः माह बाद या पति से तलाक या मृत्यु

के दो वर्षों के अंतर्गत जन्मा बच्चा उसका जायज (वैध शिशु) है।

  1. हिन्दू विधि के अनुसार पति की मृत्यु या विवाह विच्छेद के बाद, यह दस

माह है।

धारा, 280 दिन बाद जन्मे एक व्यक्ति को उसका वैध पुत्र प्रमाणित होने से अपवर्जित नहीं करती है। केवल प्रमाण का भार उस पर है। 24 इलाहाबाद 445 पिता की मृत्यु से 357 दिन बाद।

अब बच्चे की वैधता का प्रश्न उठता है तो पति-पत्नी के अधिगमन के विवाद्यक विषय पर उनकी क्षमता के संबंध में आंग्ल और भारतीय साक्ष्य विधि में अंतर है।

  1. आंग्ल विधि के अंतर्गत वे अक्षम हैं।

  2. भारतीय विधि के अंतर्गत वे सक्षम हैं।

38 मद्रास 466

28 बम्बई एल.आर. 207

धारा 113

1. धारा एक राज्यक्षेत्र के सत्तांतरण के संबंध में प्रमाण के भार के साथ व्यवहार करती है।

यह किस प्रकार सिद्ध किया जाना है कि एक राज्यक्षेत्र जो पहले ब्रिटिश भारत का एक अंग था, ब्रिटिश भारत का अंग नहीं रहा। प्रश्न केवल अकादमिक नहीं है, यह अत्यधिक व्यावहारिक महत्त्व का है। यह न्यायालय के अधिकार क्षेत्र की जड़ तक जाता