भाग -3 प्रमाण का भार - Page 185

168 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

है। यदि एक क्षेत्र ब्रिटिश भारत का अंग नहीं है तब वह किसी न्यायालय के अधिक्षेत्र के अधीन नहीं है।

  1. धारा 113 में यह प्रावधान किया गया था। इसमें कहा गया है कि भारत के गजट

में अधिसूचना है कि ब्रिटिश राज्यक्षेत्र एक स्थानिक रियासत के राजा या शासक

को सत्तांतरित कर दी गई। निर्णायक प्रमाण के रूप में लेना चाहिए कि एक वैध

सत्तांतरण ऐसे राज्यक्षेत्र को बताए गए दिनांक पर हुआ।

  1. यह धारा प्रीवी काउंसिल के द्वारा भारतीय विधायिका के अधिकार के परे घोषित

कर दी गई है और इसलिए अवैध एवं विधिक प्रभाव की नहीं है।

  1. बम्बई 367 - दामोदर गोरधान बनाम देवराम कांजी। वायसराय परिषद, 24-25

वाइस ऑर्डर 67 धारा 22 द्वारा भारत के किसी भाग पर राजा की प्रभुसत्ता

या अधिराज्यीय प्रतिष्ठा के प्रति या ब्रिटिश प्रजा की आस्था के प्रति प्रत्यक्षतः

विधि संरचना करने के लिए प्रतिकारित होते हुए, एक विधायी अधिनियम

(अर्थात् साक्ष्य अधिनियम धारा 113) द्वारा एक राज्यक्षेत्र के सत्तांतरण, उस

सत्तांतरण की प्रकृति एवं वैधता के प्रति न्यायिक परिवृच्छा को परिवर्जित

करने के निश्चायक प्रमाण की राजकीय राजपत्र मे अधिसूचना करने को

आशयित, नहीं कर सकता।

निश्चायक प्रमाण के रूप में निर्णय -

  1. जैसे कि कुछ तथ्य कुछ अन्य तथ्यों के निश्चायक प्रमाण होने वाले समझे जाते

हैं, उसी प्रकार साक्ष्य अधिनियम कुछ निर्णयों को कुछ विवाद्यक विषयों पर

निश्चायक के रूप में समझता है। धारा 41

  1. निर्णय जो निश्चायक होने वाले घोषित किए जाते हैं, वे हैंः-

(1) एक सक्षम न्यायालय के अंतिम निर्णय, आदेश या डिक्री के अनुपालन में-

(1) संप्रमाण के

(2) वैवाहिकों के

(3) नौ अधिकरणों के

(4) दीवालियापन के अधिक्षेत्र के।

जो एक विधिक चरित्र प्रदान करते हैं या एक विधिक चरित्र ग्रहण कर लेते हैं, या एक व्यक्ति को एक विधिक चरित्र या वस्तु का किसी उल्लिखित व्यक्ति के विरुद्ध नहीं, वरन् पूर्णतः सत्वाधिकृत घोषित करते हैं। निश्चायक प्रमाण हैंः-

(1) यह कि विधिक चरित्र लेन-देन के रूप में।

(2) यह कि वह निर्णय के दिन लेन-देन होता है।