171
(i) अपने मालिक के लिए कार्य करने की अभिकर्ता की शक्ति को कभी-कभी
औपचारिक मुख्तारनामा द्वारा दी जाती है।
(ii) संविधिक शक्ति जैसे बंधकी को दी गई विक्रय की शक्ति।
(iii) न्यासीगण एवं निष्पादकों के पास विभिन्न अभिव्यक्ति विवाक्षित साम्यिक
शक्तियां।
(iv) साम्यिक हित सृजित करने के लिए न्यासी नियुक्त करने की शक्ति।
- नियुक्ति की शक्ति एक व्यवहार है जो न्यास के सदृश है और उसे न्यास
से सुभिन्न किया जाए।
नियुक्ति शब्द का अभिप्राय है - संकेत देना, इंगित करना - विशिष्ट संपत्ति के लक्ष्य को घोषित करने के कार्य उस प्रयोजन के लिए प्रदत्त प्राधिकार का प्रमाण करते हुए किसी पद पर मनोनीत करने के कार्य का नियुक्ति की शक्तियां नामक अंतिम वर्ग का प्रयोग किया जाता है। जहां उनकी पूर्ण घोषणा को स्थगित करने के सिवाए भावी हितों के सृजन के लिए प्रावधान करना वांछित है।
इस प्रकार विवाह की व्यवस्था में पति-पत्नी को उनकी जीवनकाल में पति-पत्नी के लिए संपत्ति न्यास पर न्यासियों को दी जाती है और न्यास पर उत्तरजीवी की मृत्यु के बाद (i) उस विवाह के ऐसे बच्चों के लिए ऐसे अंशों में जैसे अंतरजीवी नियुक्त करेगा। (ii) ऐसे मामले में नियुक्त किए जाने पर वह बच्चा जिसके लिए वह किया जाता है ठीक उसी प्रकार लेता है मानों उसी आशय की परिसीमा मूल विलेख में की गई थी।
इस प्रकार की शक्ति जहां उसके उद्देश्यों पर प्रतिबंध है। (अर्थात् वे व्यक्ति जिनके पक्ष में उसका प्रयोग किया जा सकता है) नियुक्ति की विशेष शक्ति कही जाती है। किन्तु नियुक्ति की सामान्य शक्ति भी हो सकती है, जब इस प्रकार का प्रतिबंध हो। ताकि आदाता स्वयं नियुक्ति कर सके। ऐसे मामले में आदाता को वही विन्यास के रूप में माना जाता है। जो कि अधिकतर मामलों में संपत्ति का मालिक माना जाता है।
(i) कोई शक्ति मात्र विवेकाधिकार दी जा सकती है और इसीलिए न्यास से
सुभिन्न है, जो बाध्यता सृजित करती है या
(ii) शक्ति विवेकाधिकार के प्रयोग की बाध्यता अधिरोपित कर सकती है।
पूर्ववर्ती मामले में कोई न्यास नहीं है। परवर्ती मामले में है। पूर्ववर्ती मात्र
शक्ति कहलाती है। परवर्ती न्यास की प्रकृति की शक्ति या न्यास से संबद्ध
शक्ति कहलाती है।
(iii) मामलों का एक तीसरा प्रवर्ग भी है जो न्यास संबद्ध शक्ति है।
ये वे मामले हैं जहां एक संपत्ति का न्यासी यद्यपि उसे अपने अधीन कुछ व्यक्तियों