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अधिकारों के विषय में सामान्यतः निरंतर अनिश्चितता, संदेह एवं दुविधा की स्थिति
नहीं रहनी चाहिए।
- फलतः यदि वे लोग जो अपने साथ किए गए अपराध के लिए अनुतोष का दावा
करने के लिए अनुमत किए जाते हैं तब उन्हें एक निश्चित समय के अंतर्गत
अनुतोष पाने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए। किसी व्यक्ति को जो अपने प्रति
किए दोष को एक निश्चित समय के बाद तक सहन कर चुका है, अनुतोष से
वंचित करना कुछ भी अन्यायपूर्ण नहीं है।
परिसीमा विधि इसी सिद्धांत पर आधारित है।
यह अंतर्निहित सिद्धांत होने पर परिसीमा विधि अपने प्रवर्तन में एकांतिक है और
पक्षों के करार या व्यवहार के अधीन नहीं है। अर्थात् निम्न के कारण अधीन नहीं
है -
(i) अधित्याग
(ii) प्रथम
(iii) विबंध
(iv) पक्षों की सहमति से समय के परिवर्धन एवं न्यूनन के संबंधों में भिन्नताएं संविदा अधिनियम की धाराएं - 28 एवं 23
इस प्रकार परिसीमा विधि परक्राम्य लिखत से अलग है।
परिसीमा एवं सबूत का भार।
(1) सबूत का भार वाद पर होता है। वह सिद्ध करे कि उसका वाद समय के अंतर्गत है।
37 बम्बई एस.आर. 471 ए.आई.आर. 1935 सितम्बर
अ एक प्रजीकृत पट्टठ्ठा तारीख 8 जुलाई 1922 द्वारा एक निश्चित भूमियां ब को 25 वर्षों की कालावधि के लिए किराए पर देता है। बाद में अ ब को यह आरोप लगाते हुए कि पट्टठ्ठा अनुचित प्रभाव द्वारा लिया था, बेदखल कर देता है। ब अ को अपने कब्जे एवं उपभोग एवं भूमि के कब्जे के संबंध में हस्तक्षेप करने से रोकने के लिए स्थगनादेश हेतु अ के विरुद्ध वाद प्रस्तुत करता है।
ब की ओर से दलील दी गई कि अ पट्टठ्ठे की वैधता को चुनौती देने से इस आधार पर बाधित था कि यदि उसने पट्टठ्ठे को निरस्त करने के लिए वाद किया तो दावा परिसीमा द्वारा नामित था। दूसरे शब्दों में प्रश्न है - क्या प्रतिवादी परिसीमा विधि से आबद्ध है? उत्तर है - नहीं। धारा 3 वादी को निर्देश करती है और न कि प्रतिवादी को।
- परिसीमा का अभिवचन एवं कार्यवाही का प्रक्रम।
(1) परिसीमा का अभिवचन कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम पर उठाया जा सकता