III. भारतीय परिसीमा विधि - Page 199

182 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

III. भारतीय परिसीमा विधि

इसका लागू होना

1. राज्य क्षेत्र के संबंध में

  1. अधिनियम का विस्तार समग्र ब्रिटिश भारत है - धारा 1 (2)

  2. ब्रिटिश भारत में कार्यरत न्यायालयों में प्रस्तुत प्रत्येक वाद, अपील, दिया गया

प्रार्थना पत्र प्रत्येक पर अधिनियम लागू होता है।

  1. कोई बात नहीं कि वाद का कारण कहां हुआ। ब्रिटिश भारत में या ब्रिटिश

भारत के बाहर, यदि ब्रिटिश भारत के किसी न्यायालय में वाद प्रस्तुत किया

जाता है या अपील की जाती है या प्रार्थना पत्र दिया जाता है तो जो परिसीमा

विधि लागू होगी वह भारतीय परिसीमा विधि होगी विदेशी परिसीमा विधि

नहीं।

  1. इस नियम का एक अपवाद है जो धारा 11(2) में अधिनियमित किया गया

है जो व्यक्त करता है - विदेशों में की गई एक संविदा पर ब्रिटिश भारत

में वाद लाने पर विदेशी परिसीमा का नियम प्रतिरक्षित होगा यदि नियम

संविदा समाप्त कर दी गई है और यह कि पक्षगण ऐसे नियम द्वारा निर्धारित

समयावधि में ऐसे देश में आवास करते थे।

2. कार्यवाहियों के संबंध में

1. विशेष कार्यवाहियां

(1) मध्यस्थम कार्यवाहियां

एक समय यह संदेह किया जाता था कि क्या परिसीमा अधिनियम मध्यस्थ के समक्ष कार्यवाही पर इस आधार पर कि यह केवल न्यायालय में वादों, अपीलों एवं प्रार्थनाओं पर लागू किया जाता है और यह कि विवाचक मध्यस्थ न्यायालय नहीं था। अब यह संदेह प्रीवी काउंसिल द्वारा दूर कर दिया गया है, जिसने निर्णीत किया है कि जहां व्यक्तियों ने अपने विवाद विवाचनार्थ भेजे हैं वहां मध्यस्थ को विवाद का निर्णय विद्यमान विधि के अनुसार ही करना चाहिए और उसे परिसीमा के हर प्रतिवाद को मान्य एवं प्रभावी करना चाहिए जब तक कि पक्षों के बीच सहमति/समझौते द्वारा वह प्रतिवाद विलग नहीं कर दिया गया है।

(1929) 56 आई.ए. - 128

प्रश्न - यह निर्णय तो यहां तक अति निर्धारित करता है कि पक्षगण निजी सहमति/ समझौते द्वारा परिसीमा विधि में परिवर्तन कर सकते हैं। इससे तो संविदा अधिनियम की धारा 28 एवं 23 के प्रावधानों को अनदेखा किया जाना प्रतीत होता है।