III. भारतीय परिसीमा विधि - Page 202

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(i) उत्तराधिकार (विरासत) के प्रमाण पत्रों के प्रबंधन के संप्रमाणित पत्रों की स्वीकृति के आवेदन पत्रों के संदर्भ में

(ii) उच्च न्यायालय के नियमों के अधीन पत्रों के संदर्भ में

32 बंबई 1

48 कलकत्ता 817

46 कलकत्ता 249

(iii) स्थानीय या विशेष अधिनियम (जब तक कि ऐसा अधिनियम इसके लिए प्रावधान नहीं करता है) के अधीन आवेदन पत्रों के संपर्क में।

व्यक्तियों के संबंध में

  1. सामान्य नियम यह है कि परिसीमा का अभिवचन प्रत्येक वादी पर लागू होता है।

  2. मूलतः परिसीमा राजा पर जब वह प्रतिवादी के रूप में है तब समय का व्ययगम राजा को प्रभावित नहीं करता है वाद करता था, लागू नहीं होती थी। संवैधानिक विधि का यह सूत्र यद्यपि दांडिक अभियोजनों पर लागू होता है, जहां तक सिविल कार्यवाहियों को राजा द्वारा का संबंध है, परिसीमा अधिनियम की धारा 149 के द्वारा नकार दिया गया है, जो सरकार द्वारा दायर हर एक प्रकार के वाद पर लागू होता है और 60 वर्ष की समयावधि निर्धारित करती है। सरकार के विरुद्ध वाद साधारणतः समयावधि में ही लाने चाहिए।

15 मद्रास 315

इसी प्रकार सरकार के माध्यम से दावा करने वाले निजी व्यक्तियों के वाद भी अधिनियम द्वारा निर्धारित साधारण समयावधि के अधीन आते हैं। यह सर्वदा का नियम है। यह किसी निर्धारित समय में एक वाद लाने के लिए सरकार के लिए सर्वदा का नियम नहीं था।

यह अब परिवर्तित कर दिया गया है। अतः यह कहा जा सकता है कि नियमतः परिसीमा विधि सभी व्यक्तियों पर चाहे वे निजी व्यक्ति हों या सरकारों के नियमित संस्थान हों लागू होती है और अवधि का अभिवचन प्रतिवादी को प्रत्येक वादी के विरुद्ध प्राप्य है चाहे वह वादी एक प्राइवेट व्यक्ति है या सरकार है।

  1. परिसीमा का अभिवचन प्रत्येक प्रतिवादी के लिए उपलभ्य है। इस नियम के कुछ अपवाद हैं।

37 बंबई एस.आर. 471

धारा 10

(i) परिसीमा का अभिवचन किसी व्यक्ति, जिसमें संपत्ति किसी विशिष्ट प्रयोजन के