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लागू होती है वरन् उसे विधिक प्रतिनिधियों एवं मूल्यवान प्रतिफल के समनुदेशितियों के सिवाए समनुदेशितियों को भी लागू होती है। व्यतिक्रमी न्यासी से मूल्य के लिए क्रेतागण रक्षित होते हैं और वे परिसीमा के लिए अभिवचन कर सकते हैं।
क्या न्यासी से क्रेता निश्चिततः उसके साथ मूल्य के लिए क्रेता होने पर न्यास की सूचना के बिना भी होना चाहिए ऐसा मुद्दा जिस पर अधिनियम मौन है। इस मुद्दे पर न्यायिक निर्णयों में भी मतवैभिन्य है। धारा 29(3) II परिसीमा अधिनियम, भारतीय विवाह विच्छेद अधिनियम (चतुर्थ - 1869) के अधीन वादकारीपक्षों पर लागू नहीं होता है।
(पृष्ठ खाली छूटा - संपादक)
विशेष विधि के विरुद्ध
इस सामान्य परिसीमा विधि के अतिरिक्त अन्य विशेष या स्थानीय विधियां हैं जो भी वादों, अपीलों, या आवेदन पत्रों के लिए समयावधियां निर्धारित करती है। सामान्य विधि हम विशेष विधियों द्वारा नियम समयावधियों के बीच भेद होने की दशा में प्रश्न उठता है कि कौन सी विधि लागू होनी है।
इस प्रश्न का उत्तर धारा 29 में दिया गया है। इस धारा के अनुसार विशेष विधि, सामान्य विधि पर अभिभावी होगी।
धारा 29 समधविधि के रूप में सामान्य विधि एवं विशेष विधि के बीच विवाद के विषय में परिसीमा अधिनियम की अन्य धाराओं का लागू होना एवं न लागू होना भी प्रावधान करती है।
धारा 29 के अनुसार विवाद के विषय में धाराएं 4, 9 से 18 तक एवं 22 परिसीमा अधिनियम की लागू होंगी। जब तक कि स्पष्टतः लागू न होना नहीं किया जाता है। और शेष प्रावधान अधिनियम के लागू नहीं होंगे (जब तक कि विशेष विधि द्वारा स्पष्टतः लागू नहीं किए जाते हैं)।
परिसीमा विधि की स्कीम
भारतीय परिसीमा अधिनियम में 29 धाराएं और एक अनुसूची है।
अनुसूची तीन विभागों में विभक्त है।
प्रथम विभाग - वादों के विषय में।
द्वितीय विभाग - अपीलों के विषय में।
तृतीय विभाग - आवेदन/प्रार्थना पत्रों के विषय में।
- अनुसूची उसके प्रत्येक विभागों के संबंध में 3 स्तंभों/कालमों में बांटी गई है।