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4. परिसीमा विधि
स्तंभ 3 से उद्भूत होने वाले प्रश्न
स्तंभ 3 की विषय वस्तु
- स्तंभ 3 - परिसीमा के आरंभिक बिन्दु के विषय में है। दो प्रश्न उठते हैं।
(1) समय कब चलना आरंभ होता है? परिसीमा का आरंभिक बिंदु क्या है?
(2) क्या परिसीमा का केवल एक ही आरंभिक बिंदु है? या क्या परिसीमा का
एक नवीन आरंभिक बिंदु हो सकता है?
1. समय कब चलना आरंभ होता है?
परिसीमा का आरंभिक बिंदु क्या है?
- समय कब चलना आरंभ करता है इस प्रश्न का उत्तर यह है वाद अपील या आवेदन/प्रार्थना पत्र के प्रारंभ के संबंध में समय स्तंभ में वर्णित घटना के घटित होने से चलना आरंभ करता है। सर्वाधिक वादों में घटना आनुषंगिक होती है। किन्तु कुछ विषयों में यह वादी की घटना का प्रज्ञान होता है - 90-92 क्या यह घटना है या घटना का प्रज्ञान है किसी भी विषय में घटना का घटित होना स्तंभ 3 में परिसीमा के प्रारंभिक बिंदु को चिर्तिं करता है।
मुकदमा करने के अधिकार एवं वादकारण के संबंध में दो प्रश्न।
(1) क्या जब वाद कारण हो तो वादी को वाद चलाना ही चाहिए।
(2) वाद तक ही सीमित रहते हुए यह कहा जा सकता है कि समय चलना आरंभ
करता है जब वाद करने का अधिकार उद्भूत होता है - अनुच्छेद 120 यह
प्रथम मूल नियम है।
वाद दायर करने का अधिकार कब उद्भूत होता है? यह उद्भूत होता हैः
(i) जब स्तंभ 3 में अभिव्यक्त घटना घटित होती है यदि वाद अनुच्छेदों में से किसी के अधीन आता है।
(ii) जब वाद किसी विशेष अनुच्छेद के अधीन नहीं है वरन् सामान्य अनुच्छेद (120) के अधीन है तब वाद करने का अधिकार प्रोद्भूत होता है या विषयों में प्रज्ञान, कि वादकरण उद्भूत हो चुका है, वादी को हो जाता है तभी समय चलना आरंभ करता है वादकारण के घटित होने से या वादकारण की जानकारी की दिनांक से।
वादकारण तब उद्भूत होता है जब किसी पक्ष के साथ दोष किया जाता है। प्रत्येक दोष से आवश्यक नहीं है कि वादकारण उद्भूत करना आवश्यक बनाता हो।
(iii) परिसीमा के प्रारंभिक बिंदु पर मृत्यु का प्रभाव।