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वाद अवश्य 1928 में लाना चाहिए निर्योग्यता के अवसान के बाद तीन वर्षों के अंतर्गत।
- निर्योग्यता के इस प्रश्न के संबंध में कुछ बिंदु ध्यान में रखे जाएं।
(i) धारा केवल डिक्री के निष्पादन के लिए वादों एवं आवेदन पत्रों पर लागू
होती है किंतु किन्हीं अन्य आवेदन पत्रों पर नहीं, न अपीलों के लिए।
(ii) धारा केवल तभी लागू होगी जब एक व्यक्ति वाद करने के अधिकार के
प्रोद्भूत होने से पहले से ही एक निर्योग्यता के अधीन था। यदि निर्योग्यता
बाद में अकस्मात् होती है तब धारा लागू नहीं होती है।
(iii) वादी के विरुद्ध समय का चलना प्रारंभ हो जाएगा चाहे यहां प्रतिवादी
निर्योग्यता से पीडि़त है।
मौलिक नियम है कि परिसीमा, किसी व्यक्ति के विषय में, जो निर्योग्यता से पीडि़त नहीं है, स्तंभ 3 में वर्णित घटना के घटित होने की दिनांक से प्रारंभ होती है। यदि कोई घटना स्तंभ 3 में नहीं है तब उस दिनांक से वाद कारण का उद्भूत होना कहा जाता है।
मूल नियम - 11
- जब एक बार समय चलना आरंभ हो जाता है तो कोई पश्चात्वर्ती वाद लाने की
निर्योग्यता या असमर्थता उसे रोकती नहीं है।
- इसका अर्थ है कि परिसीमा एक बार यह आरंभ करती है तो कभी निलंबित नहीं
होती है। यदि एक व्यक्ति वाद करने के अधिकार के प्रोद्भूत हो चुकने के बाद
पागल हो जाता है या मर जाता है, समय उनके विरुद्ध निरंतर चलता रहेगा।
( ii ) क्या परिसीमा का प्रारंभिक बिंदु केवल एक ही है? या क्या परिसीमा का
एक नवीन प्रारंभिक बिंदु हो सकता है?
- एक नवीन वादकारण की घटना एवं एक नवीन प्रारंभिक बिंदु की घटना के बीच
प्रभेद अवश्य किया जाना चाहिए, यदि परिसीमा उसी वाद कारण के विषय में
है। हम यहां उन वादों पर विचार कर रहे हैं जहां उसी वाद कारण के संबंध में
परिसीमा का नवीन प्रारंभिक बिंदु होता है।
- परिसीमा विधि का सामान्य नियम है कि वाद लाने के अधिकार के लिए परिसीमा
का केवल एक प्रारंभिक बिंदु है और वह प्रारंभिक बिंदु उस दिन दिनांकित होता
है जब वाद लाने का अधिकार पैदा होता है।
- तीन मामलों में उसी वादकारण के लिए परिसीमा का नया प्रारंभिक बिंदु होता
हैः-