195
वंचित नहीं किए जाएंगे।य्
ऐसा खंड अन्य राज्यों के संविधान में नहीं पाया जाता है। तथापि सभी सम्य राज्य के अपने नागरिकों के प्राण, स्वतंत्रता एवं संपत्ति की अनपेक्षित आक्रमणों से रक्षा करना चाहते हैं।
इस प्रकार की प्रत्याभूति सभी राज्यों की बुनियाद है। इस उद्देश्य के साथ प्रत्येक राज्य की विधि संहिता होती है, जो अपराधों/दोषों को परिभाषित करती है। भारत में दंड संहिता और अपकृत्य विधि है।
- दोष या तो सिविल होता है या आपराधिक।
कुछ दोष सिविल एवं आपराधिक दोनों ही होते है।, हमला मान-हानिः ये सिविल एवं आपराधिक दोनों प्रकार के दोष हैं। व्यथित पक्ष दंड-न्यायालय एवं सिविल-न्यायालय दोनों में कार्यवाही कर सकता है।
- उपचारः यदि प्रत्येक दोष के लिए समुचित उपचार का प्रावधान किया जाए तो मात्र दोषों को, अधिनियमित करने का कोई उपयोग नहीं होगा। दूसरी ओर यह कहा जा सकता है कि विधि दोष केवल तभी अभिज्ञात करती है जब वह उसके निवारण के लिए प्रावधान कर लेती है। जब एक आपराधिक कृत्य के लिए उपचार का प्रावधान नहीं किया जाता है तो दोष का अधिनियमन निरर्थक होगा।
व्यक्ति की स्वतंत्रता और बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट
- दंड प्रक्रिया संहिता उपचारीय विधि है। यह अपराधी द्वारा किए गए आपराधिक दोष के विरुद्ध व्यथित पक्ष के लिए उपचार का प्रावधान करती है।
यह एक सामान्य धारणा है कि विधि किसी निर्दोष व्यक्ति को दंडित करने के बजाए दस अपराधी व्यक्तियों को छोड़ना अनुमत करती है।
यह नितांत गलत है। विधि मात्र यह कहती है कि विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अतिरिक्त किसी व्यक्ति का विचारण नहीं किया जाएगा।
- दंड प्रक्रिया निर्धारित करती हैः-
(1) दंड न्यायालयों का गठन।
(2) साधन एवं पद्धति जिसके द्वारा अभियुक्त को उसके विचारण के लिए
न्यायालय के समक्ष लाया जा सके।
(3) अभियुक्त के विचारण के नियम।
(4) दंड विषयक नियम, एवं
(5) अभियुक्त के विचारण दोषसिद्ध एवं दंड में त्रुटि को ठीक करने के
नियम।
* * * * *