206 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
भाग - 2
अपराधी का विचारण
1. अपराध का संज्ञान लेना
जब अपराध किया जा चुका हो तो ऐसी सूक्तियां हैं जिनके द्वारा मजिस्ट्रेट अपराध का संज्ञान ले सकता है।
धारा 190
(अ) तथ्य, जो इस प्रकार के अपराध को संघिटित करते हैं, का परिवाद पाने पर।
(ब) किसी पुलिस अधिकारी द्वारा की गई ऐसे तथ्यों की रिपोर्ट पर।
(स) किसी पुलिस अधिकारी से भिन्न किसी व्यक्ति की सूचना या अपने प्रज्ञान पर या संदेह पर कि ऐसा अपराध किया गया है।
(अ) मजिस्ट्रेट को परिवाद
1. परिवाद का अभिप्राय - मजिस्ट्रेट को मौखिक या लिखित रूप में किया गया अभिकथन, दंड प्रक्रिया संहिता के अधीन, उसके द्वारा वाद करने के दृष्टिकोण से कि क्या कोई व्यक्ति ज्ञात या अज्ञात अपराध कर चुका है किंतु इसमें पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट सम्मिलित नहीं है।
परिवाद में यह अवश्य अभिकथित किया जाए कि अपराध किया जा चुका है।
धारा 107 के अधीन कार्यवाही करने के लिए प्रार्थनापत्र परिवाद नहीं है।
परिवाद अवश्य मजिस्ट्रेट के समक्ष होना चाहिएः उसके द्वारा कार्यवाही करने की दृष्टि से होना चाहिए।
उसके द्वारा कोई कार्यवाही करने को कहने के आशय के बिना सूचना के तौर पर मजिस्ट्रेट से किया कथन परिवाद नहीं है।
उदाहरणार्थ, सहायक कलक्टर द्वारा एक पक्ष के विरुद्ध शिकायत करते हुए जिला मजिस्ट्रेट से मात्र आदेशार्थ प्रार्थना परिवाद नहीं थी।
40 ए.एल. 641
इस संहिता के अधीन कार्यवाही किए जाने की दृष्टि से हो।
इस संहिता के अधीन नहीं वरन् बंबई धूत अधिनियम 1887 की धारा 6 के अधीन कार्यवाही करने हेतु प्रेरित करने के उद्देश्य से मजिस्ट्रेट को दिया गया बयान इस धारा के अर्थ के अंतर्गत परिवाद नहीं है।