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15 सी.आर.एल.एफ. 657
II. कौन परिवाद कर सकता है?
सामान्य नियमानुसार पीडि़त व्यक्ति परिवादी होता है।
किंतु परिवादी दांडिक कार्यवाही आरंभ करने के लिए आवश्यक पक्ष नहीं है।
मजिस्ट्रेट प्राप्त सूचना पर या अपनी जानकारी पर कार्यवाही कर सकता है।
यदि वह इस प्रकार कार्यवाही करता है तो वह धारा 491 के प्रावधानों से आबद्ध होगा।
किंतु सामान्य नियम के अपवाद हैं।
ये अपवाद धाराओं 195 से 199 में मिलेंगे।
धार 195 निम्न के बारे में है -
(अ) लोक सेवकों को विधिक प्राधिकार की अवमानना के लिए अभियोजन।
(ब) लोक न्याय के कुछ अपराधों का अभियोजन।
(स) साम्य में दिए गए विलेखों से संबंधित कुछ अपराधों का अभियोजन।
(अ) के अधीन आने वाले मामलों में कोई न्यायालय संज्ञान नहीं लेगा, सिवाए
संबंधित लोक सेवक या किसी अन्य लोक सेवक जिसके वह अधीन है,
के लिखित परिवाद पर।
(ब) के अधीन आने वाले मामलों में कोई न्यायालय संज्ञान नहीं लेगा, सिवाए
ऐसे न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय के जिसके वह अधीन है, लिखित
परिवाद पर।
(स) के अधीन आने वाले मामलों में (कोई न्यायालय संज्ञान नहीं होगा) सिवाए
ऐसे न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय के जिसके ऐसा न्यायालय अधीन
है, के लिखित परिवाद पर।
धारा 196 राज्य के विरुद्ध अपराधों के लिए अभियोजन
जब तक कि सपरिषद् गवर्नर जनरल स्थानीय सरकार या सपरिषद में गवर्नर जनरल द्वारा इस हेतु शक्ति संपन्न किसी अधिकारी के आदेश द्वारा या उसके प्राधिकार से परिवाद न किए जाने पर।
धारा 196 अ
भारतीय दंड संहिता की धारा 120 ख के अधीन आने वाले आपराधिक षड्यंत्र के कुछ वर्गों के लिए अभियोजन।
यदि वे उपधारा (1) के अधीन आते हैं तब