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धारा 45
पुलिस को दी गई सूचना में संज्ञेय अपराधों या असंज्ञेय अपराधों का हवाला दिया जा सकता है।
संज्ञेय अपराध वह है जिसमें पुलिस बिना वारंट के गिरफतार कर सकती है।
असंज्ञेय अपराध वह है जिसमें पुलिस बिना वारंट के गिरफतार नहीं कर सकती है।
धारा 154
संज्ञेय अपराध के संबंध में सूचना यदि थानाध्यक्ष को मौखिक दी गई तो उसके द्वारा लिपिबद्ध की जाएगी या उसके निर्देशन में लेखबद्ध की जाएगी और सूचना देने वाले को पढ़कर सुना दी जाएगी और ऐसी हर एक सूचना चाहे लिखित रूप में दी गई या पूर्वोक्ति के समान लेखबद्ध की गई हो, उसे देने वाले को दी जाएगी और उसकी अंतवस्तु एक पुस्तक में लेखबद्ध की जाएगी जो ऐसे अधिकारी द्वारा ऐसे रूप में जैसा कि स्थानीय सरकार इस संबंध में निर्धारित करके रखा जाए।
धारा 155
असंज्ञेय अपराध के संबंध में सूचना
वह ऐसी सूचना के सारांश को वहां रखी हुई पुस्तक में लेखबद्ध करेगा और सूचना देने वाले को मजिस्ट्रेट के पास भेजेगा।
कोई पुलिस अधिकारी असंज्ञेय अपराध का, ऐसे वाद का विचारण करने या उसे विचारण के लिए सुपुर्द करने की शक्ति रखने वाले प्रथम या द्वितीय श्रेणी के मजिस्ट्रेट या प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट की आज्ञा के बिना अन्वेषण नहीं करेगा।
धारा 156
पुलिस थाने का कोई भी प्रभारी अधिकारी, किसी भी संज्ञेय अपराध का जिसे उस थाने के अधिक्षेत्र की सीमा के अंतर्गत मजिस्ट्रेट जांच करने की शक्ति रखता हो, के आदेश के बिना अन्वेषण कर सकता है। पुलिस प्रतिवेदन जो एक मजिस्ट्रेट द्वारा वाद का आधार हो सकता है, संज्ञेय अपराध से संबंधित सूचना पर आधारित होता है।
धारा 157
यदि प्राप्त सूचना से अर्थात् धारा 154 के अधीन अधिकारी संज्ञेय अपराध के घटित होने में संदेह का कारण रखता हैः-
(1) वह इस प्रतिवेदन को उसका संज्ञान लेने की शक्ति से संपन्न मजिस्ट्रेट के
पास भेजेगा_