211
धारा 161
पुलिस परिवाद के तथ्यों से परिचित साक्ष्यों का परीक्षण कर सकती है।
(2) ऐसे साक्षीगण, जब तक कि प्रश्न उनको अपराध में लिप्त नहीं करता है, किए जाने वाले प्रश्नों का उत्तर देने को बाध्य होंगे।
यद्यपि पुलिस साक्षियों के कथन ले सकती है, तो भी।
धारा 162
(अ) वे उनके द्वारा हस्ताक्षरित नहीं होंगे।
(ब) वे, जब कथन कहा गया था उस समय किसी अपराध के अन्वेषण के संबंध में किसी जांच या विचारण में प्रयुक्त नहीं किए जाएंगे।
बशर्ते अभियुक्त के निवेदन पर उसकी प्रतिलिपि ऐसे साक्ष्य का प्रतिरोध करने के लिए दी जाए परंतु न्यायालय उसे आवर्जित कर सकता है कि वह भाग अप्रासंगिक है या उसके प्रकटीकरण लोकहित में असमीचीन है या न्यायालय के साक्ष्य की वृद्धि नहीं करता है।
संक्षेप में साक्ष्य नहीं बनते हैं जिन्हें ग्राह्य कहा जा सके।
यदि ऐसे कथन साक्ष्य माने जाते हैं तो वे निश्चित पुलिस अधिकारी द्वारा नहीं, मजिस्ट्रेट द्वारा अभिलिखित होने चाहिए। फलतः दंड प्रक्रिया संहिता में प्रावधान किया गया है।
धारा 164
विशेषतः सशक्त कोई भी प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट एवं द्वितीय श्रेणी मजिस्ट्रेट यदि वह पुलिस अधिकारी नहीं है, तो कोई कथन या स्वीकृति के जो उसे इस परिच्छेद के अधीन अन्वेषण के दौरान में दिया गया था, अभिलिखित कर सकता है।
कथन, साक्ष्य के अभिकथन करने के लिए निर्धारित रीति से अभिलिखित किया जाएगा।
संस्वीकृति धारा 364 में प्रवधानित रीति से अभिलिखित की जानी है।
बशर्ते मजिस्ट्रेट ऐसी संस्वीकृति अभिलिखित करने से पूर्व अभियुक्त को स्पष्ट करेगा कि वह उसे देने के लिए बाध्य नहीं है और यदि वह ऐसा करता है तो वह उसके विरुद्ध साक्ष्य में प्रयुक्त किया जाएगा।
कोई मजिस्ट्रेट अभिलिखित नहीं करेगा, जब तक उसे यह विश्वास करने का कारण न हो कि वह स्वेच्छा से दिया गया है।
संस्वीकृति दर्ज करने पर मजिस्ट्रेट उसके नीचे एक ज्ञापन यह दर्शाते हुए देगा कि उसने शर्तों का पालन किया है।