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(2) एक अव्यक्त दोष ऐसा दोष है जिसको क्रेता स्वयं के लिए साधारण सी सावधानी से खोज नहीं सकता था (उन) दोषों को जिनकी वास्तविक या रचनात्मक सूचना क्रेता को है प्रकट करने का कोई कर्त्तव्य नहीं है।
(3) जहां तक स्पष्ट दोषों का संबंध है जिनकी जानकारी विक्रेता को नहीं है तो सूत्र क्रेता सावधान रहे लागू होता है। किंतु एक परस्पर चूक जो वस्तुतः सहमति से तात्विकतः संबंधित है, करार कोव्यर्थ कर देगी।
(4) एक अव्यक्त दोष चाहे संपत्ति का हो या हक का सारवान (भौतिक) अवश्य होना चाहिए। सारभूत होने के लिए दोष ऐसी प्रकृति का अवश्य हो कि उसे युक्तियुक्ततः माना जा सके कि यदि क्रेता को उसकी जानकारी होती तो वह जरा भी संविदा नहीं करता क्योंकि उसने जिसे खरीदने के लिए संविदा की थी से भिन्न वस्तु प्राप्त कर रहा होगा।
(5) क्या कोई दोष तात्विक है या नहीं हर एक वाद की परिस्थितियों पर निर्भर करता है जब एक भूमि भवन बनाने के उद्देश्य से बेची गई थी एक भूमिगत नाले को एक सारवान दोष निर्धारित किया गया था, किंतु तब नहीं जब मकान या भूमि को मुख्यतः आवास के लिए बेचा गया था।
(6) दोष संपत्ति में या हक में हो सकते हैं।
- धारा 55 (1) (ख) हक विलेखों का प्रस्तुतीकरण
(1) बाध्यता निरीक्षण के लिए हक विलेखों को प्रस्तुत करना है और देने के लिए नहीं।
(2) निरीक्षण के लिए प्रस्तुत किए जाने वाले अपेक्षित अभिलेख ही अभिलेख नहीं है जो विक्रेता के कब्जे में है वरन् वे अभिलेख भी सम्मिलित हैं जिनको प्रस्तुत करना उसकी शक्ति में है।
(3) जब तक क्रेता मांग नहीं करता है तब तक हक विलेखों को प्रस्तुत करने की बाध्यता नहीं है।
(4) फिर भी क्रेता को निरीक्षण करना निश्चिततः नहीं छोड़ना चाहिए, अन्यथा वह विषयों की रचनात्मक सूचना पाने वाला माना जाएगा, जिन्हें वह खोज लेता यदि उसने हक की छानबीन की होती।
- धारा 55 (1) (ग) - प्रश्नों का उत्तर देना विक्रेता का कर्त्तव्य
(1) जब हक के अभिलेख प्रस्तुत कर दिए गए हों तो क्रेता उनका परीक्षण करता
है और यदि वह संतुष्ट नहीं है तो मांग करता है। ये अपेक्षाएं हैं।
(i) हक से संबंधित।