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कोई मूल्यवान प्रतिफल उसके सृजन के लिए नहीं दिया गया है।
(3) यदि मूल्य दिया गया है तो यह निरर्थक है कि क्या न्यास पूर्ण है या नहीं क्योंकि साम्या उसको एक कृत कार्य के रूप में देखती है जिसका होना करार सम्मत है। मूल्य के लिए अपूर्ण हस्तांतरण, हस्तांतरण करने की संविदा मानी जाएगी और न्यायालय देखेगा कि वह पूर्ण है।
(4) यदि मूल्य नहीं दिया गया है तो साम्या नहीं है और न्यायालय उसके प्रवर्तन की मांग करने वाले व्यक्ति को कोई सहायता नहीं देगा।
(5) यदि संपत्ति का परिपूर्ण हस्तांतरण है, यद्यपि वह स्वैच्छिक है तथापि वस्तुतः विधिक हस्तांतरण होने पर न्यास न्यायालय द्वारा प्रवर्तित कराया जाएगा।
(6) दो विधाएं हैं जिनमें न्यास पूर्णतः गठित किया जा सकता हैः-
(i) व्यवस्थापक संपत्ति न्यासियों को हस्तांतरित कर सकता है।
(ii) व्यवस्थापक स्वयं को उसका न्यासी होने की घोषणा कर सकता है।
(7) पूर्ण एवं अपूर्ण न्यास में अंतरः-
(i) एक पूर्ण गठित न्यास वह है जिसमें न्यास संपत्ति अंततः एवं पूर्णतः
न्यासियों में निविष्ट नहीं किया गया है।
(ii) न्यास अपूर्णतः गठित है जब न्यास संपत्ति अंततः एवं पूर्णतः न्यासियों
में निविष्ट नहीं किया गया है।
टिप्पणः विलों के अधीन उद्भूत सभी न्यास पूर्णतः गठित है यद्यपि वे या तो निष्पादित
है या निष्पादेय है।
(ii) न्यास अपूर्णतः गठित है जब न्यास संपत्ति अंततः एवं पूर्णतः न्यासियों में
निविष्ट नहीं किया गया है।
(iii) एक व्यवस्थापक को सभी संभव उपाय करने चाहिए कि संपत्ति को
न्यासों में निविष्ट करना उसका कर्त्तव्य है। हस्तांतरण की लिखत में न्यास
की घोषणा भी अवश्य अंकित होनी चाहिए यदि व्यवस्थापक का आशय
विफलता से बचने का है।
(8) इस अंतर से उद्भूत होने वाले परिणामः-
(i) एक अपूर्ण न्यास प्रवर्तित किया जाएगा यदि वह मूल्यवान प्रतिफल के
लिए है। उसे प्रवर्तित नहीं किया जाएगा यदि वह स्वैच्छिक है, अर्थात्
बिना मूल्यवान प्रतिफल के है।
(ii) न्यास विधि में मूल्यवान प्रतिफल जैसे कि संविदा विधि में है, मौद्रिक