228 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
- धनीय शर्तों पर निर्धारण योग्य कोई मूल्यवान वस्तु है, इस परंतुक के
साथ कि विवाह और वाद लाने की प्रवृत्ति पर इसी प्रकार विचार किया
जाए।
(iii) मूल्यवान प्रतिफल एवं उत्तम प्रतिफल के मध्य एक अंत विद्यमान रहता
है। उत्तम प्रतिफल वाक्यांश प्रेम एवं स्नेह के लिए प्रयुक्त होता है। इस
प्रकार का प्रतिफल यद्यपि उत्तम है फिर भी मूल्यवान नहीं है।
(iv) उत्तम प्रतिफल से एक अपूर्ण गठित न्यास नहीं होता जो एक स्वयंसेवक
के कहने पर प्रवर्तनीय हो। वह फलित न्यास को खंडित करने का काम
करता है।
(v) विवाह कहां तक प्रतिफल है?
(1) यदि विवाह पूर्ण एवं विवाह के प्रतिफल में व्यवस्थापन किया जाता है तो वह मूल्यवान प्रतिफलार्थ किया जाता है। ऐसा तब भी है यदि विवाहोपरांत किया जाता है, किंतु एक वैवाहिक पूर्ण व्यवस्था करने के करार की पूर्ति में।
(2) किंतु यदि व्यवस्थापन विवाह के बाद किया जाता है न कि विवाहपूर्व करार के अनुसरण में, तो वह स्वैच्छिक है।
(vi) वैवाहिक प्रतिफल में कौन आते हैंः-
(1) वैवाहिक प्रतिफल के अंतर्गत वास्तविक पक्ष आते हैं अर्थात् पति-पत्नी एवं उनके उस विवाह से हुए बच्चे।
(2) सभी अन्य व्यक्ति स्वयंसेवक हैं और वे व्यवस्थापक के विरुद्ध के प्रावधानों को प्रवर्तित नहीं करा सकते जहां तक संपत्ति का अंतरण अपूर्ण है - जैसे बाद में व्यवस्थित किए जाने वाला करार - अर्जित संपत्ति।
- क्या भारतीय न्यास अधिनियम पूर्ण न्यास एवं अपूर्ण न्यास में इस अंतर को मान्यता प्रदान करता है -
साधारण एवं विशेष न्यास
साधारण न्यास वह न्यास है जिसमें न्यासी न्यास संपत्ति का मात्र निष्क्रिय अभिरक्षक है और करने के लिए कतई सक्रिय कर्त्तव्य नहीं करता है।
विशेष न्यास, वह न्यास है, जिसमें व्यवस्थापक द्वारा इंगित विशेषतः किसी योजना को पूरा करने के लिए न्यासी नियुक्त किया जाता है और व्यवस्थापक के आशा को कार्यान्वित करने के लिए सक्रियतः स्वयं को लगाने की अपेक्षा की जाती है।
साधारण न्यास निष्क्रिय न्यास जैसा कहा जाता है और विशेष न्यास सक्रिय न्यास कहा जाता है।