230 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
द्वितीय भाग
अभिव्यक्त या घोषित न्यास
अध्याय 1 - घोषित न्यास के दो प्रकार हैं -
(i) निष्पन्न
(ii) निष्पाद्य
अध्याय 2 - अभिव्यक्त न्यास का सृजन।
अध्याय 3 - अभिव्यक्त / घोषित न्यास का प्रतिसंहरण।
अध्याय 4 - अभिव्यक्त न्यास का निर्वापन।
अध्याय - 1
घोषित न्यास के दो प्रकार हैं
निष्पन्न एवं निष्पाद्य
घोषित न्यास या तो निष्पन्न न्यास होता है या निष्पाद्य न्यास।
(i) निष्पन्न एवं निष्पाद्य न्यास
निष्पन्न एवं निष्पाद्य पदों का जैसे वे संविदा के संबंध में प्रयुक्त किए जाते हैं वही अर्थ नहीं है जो तब होता है जब न्यास के संबंध में प्रयुक्त किए जाते हैं।
जब संविदा के संबंध में प्रयुक्त किए जाते हैं तो वे संविदा को कार्यान्वित किए जाने को निर्देशित करते हैं। जब न्यास के संबंध में प्रयुक्त किए जाते हैं तो उसके कार्यान्वित करने से प्रभिन्न रूप में न्यास को सृजित किया जाना निर्देशित करते हैं।
जिस अर्थ में यह शब्द संविदा में प्रयुक्त किया जाता है उसमें प्रत्येक न्यास जब तक वह खत्म न हो जाए, निष्पाद्य है। किंतु उसका यह अर्थ नहीं है जिसमें यह शब्द न्यास के संबंध में प्रयुक्त होता है।
जब निष्पन्न एवं निष्पाद्य शब्द न्यास के संबंध में प्रयुक्त किए जाते हैं तो उनके भिन्न अर्थ होते हैं।
(1) न्यास, निष्पन्न न्यास है जब न्यास का रचयिता न केवल उन व्यक्तियों
को जो न्यास से लाभान्वित होने हैं पदानिहित करता है वरन् उन हितों
को भी इंगित करता है जो न्यास संपत्ति में लेने हैं।
(2) न्यास एक निष्पाद्य न्यास कहा जाता है जब न्यास का रचयिता केवल उन
व्यक्तियों को पदानिहित करता है जो न्यास से लाभान्वित होने हैं किन्तु उन
हितों को इंगित नहीं करता है जो न्यास संपत्ति लेते हैं क्योंकि इसे अन्य व्यक्ति
द्वारा एक अन्य विलेख के द्वारा परिभाषित करने को छोड़ दिया गया है।