231
दृष्टांतः- अ एवं ब के विवाह पर उनमें यह करार किया जाता है उनके बीच की निश्चित संपत्ति उनके लिए एवं उनके बच्चों के लिए न्यास में व्यवस्थित कर दी जाएगी।
टिप्पणीः- यहां वे पक्ष जो न्यास द्वारा लाभान्वित होते हैं इस प्रकार परिभाषित किए जाते हैं - अ एवं ब तथा उनके बच्चे।
(1) किंतु जो लाभ अ एवं ब तथा उनके बच्चों को लेने हैं वे परिभाषित नहीं किए गए हैं।
(2) अतः यह निष्पाद्य न्यास है।
(3) निष्पन्न न्यास एवं निष्पाद्य न्यास के बीच भिन्नता की रेखा एक पूर्णतः गठित न्यास एवं अपूर्णतः गठित न्यास के बीच की विभिन्न रेखा से भिन्न है।
(4) एक पूर्णतः गठित न्यास एवं एक अपूर्ण न्यास के बीच विभिन्न रेखा हैः- पूर्ववर्ती में संपत्ति न्यास के न्यासियों में निविष्ट होती है। पश्चात्वर्ती में वह इस प्रकार निविष्ट नहीं होती है।
(5) निष्पन्न न्यास एवं निष्पाद्य न्यास के बीच विभिन्न रेखा है कि पूर्ववर्ती में लाभग्राहियों के हित परिभाषित होते हैंः पश्चात्वर्ती में इस प्रकार परिभाषित नहीं होते हैं।
(6) ऐसा होने पर निष्पाद्य न्यास पूर्णतः गठित न्यास हो सकता है।
11. न्यास के पक्षगण
- प्रकटतः न्यास के संव्यवहार में तीन पक्ष होते हैं -
(i) वह पक्ष जो न्यास को बनाता है।
(ii) वह पक्ष जो न्यास को स्वीकार करता है।
(iii) वह पक्ष जिसके हित के लिए न्यास बनाया जाता है।
वह पक्ष जो न्यास को बनाता है, न्यास रचयिता कहा जाता है। वह पक्ष जो न्यास को स्वीकार करता है न्यासी कहलाता है। वह पक्ष जिसके हित के लिए न्यास बनाया जाता है रचयिता और न्यासी द्वारा स्वीकार किया जाता है, लाभग्राही कहलाता है।
क्या यह आवश्यक है कि तीनों पक्ष भिन्न एवं पृथक होने चाहिए और तीनों में से एक उनमें से दो में किसी की भूमिका में दखल नहीं कर सकता।
(i) न्यास रचयिता एवं लाभग्राही सुभिन्न एवं पृथक हों।
(ii) न्यासी एवं लाभग्राही सुभिन्न एवं पृथक हों।
(iii) न्यास रचयिता का न्यासी से सुभिन्न एवं पृथक होना आवश्यक नहीं है।
- वे कारण कि कुछ पक्ष एक में दो की भूमिका में दखल कर सकते हैं और कुछ नहीं कर सकते हैं, महत्त्वपूर्ण है।
(i) न्यास का सृजन संपत्ति में, जो न्यास की विषय वस्तु है, दो संपदाएं बनाने