232 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
में फलित होता है - विधिक और साम्यिक। न्यास, जब तक ये दोनों हित पृथक रहते हैं, बना रहता है।
(ii) यदि विधिक एवं साम्यिक संपदाएं उसी एक व्यक्ति में मिलने वाली हो जाती हैं वो विधि में समहृत हो जाने से साम्यिक सर्वदा के लिए संपत्ति हो जाती है। दूसरे शब्दों में जहां विधिक एवं साम्यिक हित समविस्तीर्ण है और एक ही व्यक्ति में निविष्ट है तो साम्यिक विधि के हित में विलीन हो जाता है जिसका अभिप्राय है कि न्यास का अंत हो जाता है।
ध्यान में रखे जाने वाले दो सिद्धांत हैंः-
(i) यदि वह एक पृथक साम्यिक हित सृजित नहीं करता है तो वह न्यास नहीं है।
(ii) यदि पृथक विधिक एवं साम्यिक हित विलय हो जाते हैं तो वह न्यास नहीं है।
- इन दो सिद्धांतों को लागू करके हम निम्नोक्त निष्कर्षों पर पहुंचते हैंः-
(i) जब न्यास रचयिता एवं न्यासी एक ही हैं तो विलय नहीं है। अतः उन्हें भिन्न होना आवश्यक नहीं है।
(ii) जब न्यास रचयिता एवं लाभग्राही वही है तो पृथक साम्यिक हित का सृजन नहीं होता है। अतः वे अवश्य प्रभिन्न हों।
(iii) जब न्यासी एवं लाभग्राही एक ही हैं तो वहां विलयन है। अतः निश्चिततः सुभिन्न होने चाहिए।
सारांश
न्यास रचयिता एवं न्यासी एक ही व्यक्ति हो सकता है किंतु लाभग्राही सर्वदा न्यास रचयिता एवं न्यासी से पृथक एक सुभिन्न व्यक्ति होना चाहिए।
- अब तक हमने साधारण मामलों को लिया है जहां पक्षगण अकेले व्यक्ति हैं। जब बहुगुणित पक्षगण है और जहां उनमें से कुछ दोहरी भूमिका निभाते हैं तो क्या होता है।
दृष्टांतः-
(i) अ और ब एक न्यास के लाभग्राही हैं। उनमें एक अ न्यास का न्यासी भी है। क्या इस प्रकार का न्यास विधिमान्य है?
(ii) अ और ब एक न्यास के लाभग्राही हैं। उनमें से अ न्यास का रचयिता है। क्या ऐसा न्यास विधिमान्य है?
- प्रथम प्रश्न का उत्तर स्वीकारात्मक है। यह धारा 6 में पाया जाता है जो न्यास को परिभाषित करती है। परिभाषा दूसरे प्रश्न का उत्तर नहीं देती है। तो भी ऐसा न्यास अविधिमान्य है।