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किंतु एक अस्तित्वयुक्त न्यास के अधीन लाभप्रद हित का कोई न्यास नहीं हो सकता है। लाभग्राही न्यास में अपने हित का न्यास सृजित नहीं कर सकता उसका हित अंतरणीय है किंतु वह उसका न्यास सृजित नहीं कर सकता है।
यह अंग्रेजी न्यास विधि एवं भारतीय न्यास विधि के बीच एक महत्त्वपूर्ण अंतर दर्शाता है।
अंग्रेजी विधि के अंतर्गत लाभग्राही अपनी साम्यिक संपत्ति का न्यास सृजित कर सकता है।
कारण यह है कि भारतीय विधि न्यास में विधिक एवं साम्यिक संपदाओं के बीच अंतर नहीं मानती।
धारा 11 - न्यास उचित रूप से सृजित हो सकता है और फिर भी अप्रवर्तनीय हो सकता है।
- न्यास उचित रूप से सृजित हो सकता है किंतु प्रवर्तनीय नहीं हो सकता है। प्रवर्तनीय होने के लिए न्यास को दो अन्य शर्तें पूरी करनी चाहिएः-
(1) न्यास का उद्देश्य अविधिपूर्ण न हो।
(2) न्यास के सृजन की औपचारिकताएं पूरी कर दी गई हों।
न्यास का उद्देश्य
धारा 4
न्यास का उद्देश्य विधिपूर्ण हो।
विधिपूर्ण उद्देश्य क्या है?
(1) प्रयोजन विधि द्वारा वर्जित न रहा हो।
(2) प्रयोजन ऐसा न हो जो यदि अनुज्ञात हो तो किसी अन्य विधि के प्रावधानों को विफल करेगा।
अविधिपूर्ण उद्देश्य क्या है?
(1) प्रयोजन जो कपटपूर्ण है।
(2) वह प्रयोजन जो उस व्यक्ति या अन्य व्यक्ति की संपत्ति की क्षति को अंतर्ग्रस्त या विवक्षित करता है।
(3) वह प्रयोजन जो अनैतिक है या लोक नीति के विपरीत है।
दृष्टांतः-
(1) न्यास जो वेश्याओं के रूप में प्रशिक्षित किए जाने वाली महिला परित्यक्ताओं
की देखरेख के लिए हैं।