अभिव्यक्त न्यास का निर्वापन - Page 260

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अध्याय - 4
अभिव्यक्त न्यास का निर्वापन

धारा 77

  1. न्यास निम्नलिखित दशाओं में समाप्त हो जाता हैः-

(i) जब प्रयोजन पूर्णतः संपन्न हो गया है।

(ii) जब इसका प्रयोजन अविधिपूर्ण हो जाता है।

(iii) जब इसका पालन असंभव हो जाता है।

(iv) जब न्यास के प्रतिसंहरणीय होने पर अभिव्यक्ततः प्रतिसंहरित किया जाता है।

(v) यदि मात्र एक लाभग्राही है या अनेक लाभग्राही है। (चाहे वे साथ-साथ हकदार हों या उत्तरोत्तर) और वे किसी अयोग्यताधीन है या नहीं है जैसे, विक्षिप्त न्यास उनके द्वारा व्यवस्थापक या न्यासियां की इच्छाओं के संदर्भ के बिना निर्वापित किया जा सकता है।

  1. न्यास के अवसान की शर्ते वही हैं जो संविदा के अवसान की हैं।

(1) विचार करने के लिए दो प्रश्न रह जाते हैंः-

(i) न्यास कब प्रशासनीय हो जाता है?

(ii) न्यासी एवं लाभग्राही न्यास में क्या संपदा रखते हैं?

(2) ये प्रश्न प्रारंभिकतः न्यास के प्रशासन के प्रश्न के हैं।

(i) न्यास कब कार्य करना आरंभ करता है?

एक न्यास प्रशासनीय हो जाता ळै जब वह न्यासी एवं लाभग्राही द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है -

(i) यद्यपि न्यास रचयिता एक व्यक्ति को न्यासी के रूप में नियुक्त कर सकता है किंतु नियुक्त व्यक्ति ऐसी नियुक्ति को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं है।

(ii) न्यासी के पद पर नियुक्त व्यक्ति पद को स्वीकार कर सकता है या वह उसे अस्वीकार कर सकता है।

  1. पद का स्वीकरण अभिव्यक्ततः या आचरण से इंगित किया जा सकता है। यदि वह आचरण से है तो उसे ऐसे स्वीकरण को समुचित निश्चितता के साथ अवश्य इंगित करना चाहिए।

दृष्टांतः- अ अपनी विल द्वारा कतिपय संपत्तियां ब एवं स न्यासियों को द के लिए प्रदान करता है। ब एवं स अ की विल को प्रमाणित करते हैं। यह प्रश्न उठाए जाने पर कि क्या ब एवं स ने न्यासी का पद स्वीकार कर लिया था, धृत किया कि उनका विल को प्रमाणित करने का व्यवहार पद के स्वीकरण के समान था।