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- अवैध न्यास के पक्षों के अधिकारों को अधिशासित करने वाले सामान्य सिद्धांतों
और उन सिद्धांतों के अपवाद निम्नानुसार निरूपित किए जा सकते हैंः-
I. जहां न्यास एक अविधिपूर्ण एवं कपटपूर्ण प्रयोजन के लिए सृजित किया जाता है वहां न्यायालय न तो लाभान्वित होने वाले के लिए आशयित पक्षों के हित में न्यास को प्रवर्तित करेगा न वह व्यवस्थापक की संपदा के प्रत्युद्धरण करने में सहायता करेगा। (एक स्थिति के सिवाए)
प्रश्न - उसे प्रवर्तित करने के लिए लाभग्राही को क्यों अनुमत नहीं किया जाता है?
उत्तर - क्योंकि यह एक अविधिपूर्ण प्रयोजन को प्रभावी बनाएगा।
प्रश्न - रचयिता को संपदा के प्रत्युद्धरण के लिए क्यों अनुमत नहीं किया जाता है यदि वह उसे छोड़ चुका है?
उत्तर - क्योंकि वह उसके अपने कपट का लाभ लेने में सहायता करेगा।
II. एक मामला जिसमें व्यवस्थापक संपत्ति का प्रत्युद्धरण करने के लिए अनुमत किया गया यद्यपि न्यास अविधिपूर्ण प्रयोजन के लिए है, वह मामला है जिसमें अविधिपूर्ण प्रयोजन प्रभावी होने में विफल हो चुका है।
प्रश्न - यह अपवाद क्यों बनाया गया है?
उत्तर - इसके दो कारण हैंः-
(i) प्रयोजन अविधिपूर्ण होने पर कोई न्यास नहीं उद्भूत हुआ, क्योंकि प्रारंभ से ही शून्य था।
(ii) न्यासी मूल्य न अदा करने पर संपत्ति में कोई लाभकर हित रखने का अधिकार नहीं रखता है जो इसलिए व्यवस्थापक को अवश्य वापस होनी चाहिए।
III. अविधिपूर्ण न्यास के रचयिता से जुड़ी अयोग्यताएं उसके विधिक प्रतिनिधियों पर लागू नहीं होती।
प्रश्न - क्यों?
उत्तर - क्योंकि वे संव्यवहार पक्ष नहीं है।
- धारा 85 विधिक प्रतिनिधियों के पक्ष में न्यास को मान्यता क्यों प्रदान करती है। इसका कारण है क्योंकि वे अनभिज्ञ पक्ष है उनका अविधिपूर्ण न्यास से कोई सरोकार नहीं है।
2. अनुचित लाभ से उद्भूत होने वाले आन्वयिक न्यास I. धारा 85
- इस शीर्ष के अंतर्गत प्रथम मामला वहां उद्भूत होता है जहां किसी विल के अधीन
संपत्ति वसीयत की जाती है और विलकर्ता अपने जीवनकाल में विल का प्रतिसंहरण
करना चाहता है और वह उसका प्रतिसंहरण करने से प्रपीडन द्वारा रोका जाता है। 2. ऐसी परिस्थितियों के अंतर्गत वसीयतदार संपत्ति को उसके एक हितकारी स्वामी