254 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
के रूप में नहीं लेता वरन् वसीयतकर्ता के विधिक प्रतिनिधियों के लिए। उसे एक
न्यासी के रूप में धारण करता है।
- कारण है कि वसीयतदार ने अनुचित साधनों से अनुचित लाभ लिया है। वह इसलिए
ऐसे लाभ को रखने के लिए अनुमत नहीं किया जा सकता है।
II. धारा 88
दूसरा मामला तब उद्भूत होता है जब कोई व्यक्ति जो किसी अन्य व्यक्ति के हित को उसके साथ अपने विश्वासप्रद संबंध के कारण संरक्षित करने के लिए बाध्य है।
वे व्यक्ति जो इस संवर्ग में आते हैं इस प्रकार हैंः-
(i) अभिकर्ता एवं मालिक।
(ii) फर्म के भागीदार।
(iii) संरक्षक एवं संरक्षित।
(iv) न्यासी एवं लाभग्राही।
(v) निष्पादक एवं वसीयतदार।
- धारा में व्यक्त हैं -
(i) कि ऐसा व्यक्ति जो स्वयं अपनी विश्वस्तता का लाभ उठाते हुए धनीय लाभ लेता है।
(ii) किसी व्यवहार में उन परिस्थितियों में प्रवेश करता है जिनमें उसके अपने हित, उस व्यक्ति के जिसको वह संरक्षित करने के लिए बाध्य है, हितों के प्रतिकूल है और एतद्द्वारा स्वयं के लिए धनीय लाभ लेता है। तब वह इस प्रकार प्राप्त लाभ को उस व्यक्ति के लिए धारण करे जिसके हित को संरक्षित करने के लिए वह बाध्य था।
- दृष्टांतः-
(i) कोई भागीदार अपनी फर्म से संबंधि निधि से अपने नाम में एक भूमि खरीदता
है, वह भागीदारों के लाभ के लिए अवश्य धारण करे।
(ii) कोई न्यासी, अपने न्यास से अपने सहन्यासी द्वारा उसको दी गई घूस के प्रतिफल
में सेवानिवृत्त होता है। न्यासी निश्चित ही उस धनराशि को न्यासी के लाभ के
लिए धारण करे।
(iii) कोई अभिकर्ता अ द्वारा एक निश्चित संपत्ति को ब से पट्टठ्ठे पर उपलब्ध करने
हेतु नियुक्त किया जाता है। अभिकर्त्ता ने अपने लिए एक पट्टठ्ठा प्राप्त किया।
अभिकर्ता निश्चित रूप से उसे बके लाभ के लिए धारण करे।
(iv) कोई संरक्षक अपने संरक्षित की संपत्ति पर अधिभारों को कम मूल्य पर खरीदता
है। वह संरक्षित से केवल अधिभारों के लिए वास्तविक अदा किए गए मूल्यों
को ले सकता है।