256 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
3. संविदाओं से उद्भूत होने वाले आन्वयिक न्यास
I . धारा 86
- इस शीर्ष के अंतर्गत संविदा अधिनियम में विचारित प्रथम मामला संपत्ति के अंतरण
की संविदा से संबंधित है।
- यह धारा 86 में आता है। धारा 86 ऐसी संविदा का हवाला देती है जिसके अनुसरण
में संपत्ति अंतरित की जाती है और जहां संविदा का स्वरूप ऐसा है कि -
(i) वह समर्पण के दायित्वाधीन है या
(ii) वह कपट या भूल से उत्प्रेरित है।
- संपत्ति का अंतरिती ऐसी संविदा के अधीन संपत्ति को अंतरक से लाभ के लिए
धारण करेगा।
- यह दायित्व कुछ परिस्थितियों में आता है और वह पूर्ण नहीं है।
(i) दायित्व केवल अंतरक की सूचना प्राप्त करने पर ही उद्भूत होता है कि
संविदा समर्पण के दायित्वाधीन है या यह कपट या भूल से उत्प्रेरित किया
गया है।
(ii) दायित्व केवल अंतरिती के द्वारा वस्तुतः अदा किए गए मूल्य की अंतरक
द्वारा अदायगी पर प्रवर्तित किया जाएगा।
II. धारा 91
- सूचना के साथ संपत्ति को प्राप्त करना, अर्थात् किसी अन्य व्यक्ति के साथ संविदा
के अधीन।
- ऐसे मामले में वह व्यक्ति जो संपत्ति को प्राप्त करता है और उस व्यक्ति के लिए
धारण करे जो उसमें संविदागत अधिकारों को रखता था।
- यह बाध्यता अपने विस्तार में सीमित है। संविदा को प्रभावी बनाने के लिए
आवश्यक सीमा तक ही प्रवर्तित किया जाता है।
- यह बाध्यता उस संपत्ति जो एक संविदा के अधीन है कि हर प्रापण के मामले
में उद्भूत नहीं होती है। यह केवल ऐसी संविदा की दशा में ही लागू होता है जो
विशिष्टतः कराया जा सकता था।
III. धारा - 92
- संपत्ति कुछ व्यक्तियों के लिए विश्वास पर धारण करने के लिए खरीदी गई।
- अ एक संपत्ति ब से क्रय करने के लिए संविदा करता है और ब से अभिवेदन
करता है कि उसके खरीदने का प्रयोजन संपत्ति को स के लिए न्यास पर धारण
करना है।