भारतीय न्यास अधिनियम - Page 281

264 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

(2) जहां पर्सनेलिटी संपत्ति को किसी व्यक्ति के लिए छोड़ देने की प्रसंविदा है और प्रसंवेदक से वसीयती मर जाता है और एतद् द्वारा संपत्ति वास्तव में उस व्यक्ति के पास आ जाती है।

III. प्रथम वर्ग में उद्भूत होने वाले वाद

(i) दृष्टांतः- पहले ही दिया जा चुका है।

महत्त्वपूर्ण बिंदुः-

(i) जहां क्रीत भूमियां प्रसंविदित भूमियों से कम मूल्य की हैं, वे संविदा के आंशिक पालन में क्रीत मानी जाएगी।

(ii) जहां प्रसंविदा भूमियों के भावी क्रय की और इंगित करता है, वे भूमियां जिनका प्रसंवेदक प्रसंविदा के समय पहले ही पर्यवासित है। आंशिक निष्पादन में नहीं ली जानी है।

(iii) उस प्रसंविदित (भूमि) की प्रकृति से भिन्न प्रकृति की संपत्ति जो प्रसंवेदक द्वारा क्रय की जाने वाली थी, पालन के सिद्धांत के अधीन नहीं है।

IV. वाद जो द्वितीय वर्ग के अंतर्गत आते हैंः

(1) प्रसंविदा कुछ धन छोड़ जाने का है।

अ ने अपने विवाह के पूर्व अपनी पत्नी के लिए 620 पाउंड छोड़ जाने की प्रसंविदा की। उसने विवाह किया और वसीयत विहीन मर गया। वसीयत विहीनता के अंतर्गत उसकी पत्नी का अंश 620 पाउंड से कम था। पत्नी ने प्रसंविदा के पालन के लिए वाद फाइल किया। प्रश्न था वसीयत विहीनता पर 620 पाउंड प्राप्त करना। क्या वह प्रसंविदा का पालन नहीं था। यह अभिनिर्धारित किया गया था ताकि विधवा पत्नी वसीयत विहीनता पर अपने अंश का 620 पाउंड के ऊपर संविदा के अधीन ऋण के रूप में दावा न कर सके।

(2) इस वाद में प्रसंविदा का पूर्णतः पालन हुआ, तथापि प्रसंविदा के अंतर्गत देय धन से प्राप्त हुआ धन कम था, पालन का सिद्धांत लागू होगा और प्रसंविदा उस सीमा तक पालन की गई अभिनिर्धारित की जाती।

(3) ध्यान में रखे जाने वाले दो बिंदुः

(i) जहां प्रसंवेदक की मृत्यु उस समय पर या उससे पूर्व होती है जब बाध्यता उत्पन्न होती है, वहां पालन होता है।

(ii) जहां प्रसंवेदक की मृत्यु बाध्यता के देय पर उद्भूत हो चुकने के बाद धारित होती है वहां पालन नहीं है।