भाग के वाद में - जहां संपत्ति वास्तव में बच्चे को हस्तांतरित कर दी जाती है और तब या तो एक वसीयत या दाय भाग के द्वारा एक प्रावधान किया जाता है - संक्षेप में यह केवल जहां प्रथम दाय भाग मात्र एक ऋण है, लागू होता है।
(3) व्यक्ति, जो प्रावधान करता है, माता पिता या उनके स्थान पर व्यक्ति है - अतः यदि कोई व्यक्ति किसी बाहरी व्यक्ति को एक वसीयती संपत्ति देता है और तदन्तर बाहरी व्यक्ति पर व्यवस्थापन करता है या वह प्रतिकूल है तो बाहरी व्यक्ति दोनों को ले सकता है, दोहरे भाग का नियम उसके लिए लागू नहीं होताः-
(i) अधर्मज बच्चा एक बाहरी व्यक्ति (या अजनबी है)
(ii) प्रपौत्र भी एक बाहरी व्यक्ति है।
(iii) बाहरी व्यक्ति एक बच्चे के अंश की तुष्टि का लाभ नहीं ले सकता।
III. उसी विल या एक विल एवं कोडियल द्वारा प्रदत्त दो वसीयती संपत्ति के वादः-
(i) प्रश्न है कि क्या द्वितीय संपत्ति प्रथम की अतिरिक्त या मात्र पुनरावृत्ति होनी आशयित है।
(ii) निदर्शक वाद है हूबी बनाम हाटोन। बी.आर.ओ.सी.सी. 390 एन
(iii) प्रथकतः विचारणीय वादों के दो वर्गः-
(1) जहां वसीयत की विषय-वस्तु एक वस्तु है।
(2) जहां वसीयत की विषय-वस्तु धन है।
(iv) जहां वसीयत की विषय-वस्तु एक वस्तु हैः-
नियम - जहां वही वस्तु दो बार दी जाती है - अतिरिक्त नहीं वरन् पुनरावृत्ति है।
(v) जहां वसीयत संपत्तियां धनीय संपत्तियां हैंः-
(1) जैसे कि दान उसी लिखित में अंकित है या विभिन्न लिखितों में उसी के अनुसार नियम बदल जाता है।
(2) उसी लिखित में दो (धनीय) वसीयत संपत्तियां।
नियम -
(i) यदि समान (बराबर) - पुनरावृत्ति।
(ii) यदि असमान (समुच्चयी)।
(3) भिन्न-भिन्न लिखितों में दो धनीय वसीयत संपत्तियां।
नियम - वे समुच्चयी है।
अपवादः- यदि दोनों के लिए एक ही हेतु व्यक्त किया जाता है और उतना