268 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
ही धन दिया जाता है तब पुनरावृत्ति।
ब वाद जिनमें पूर्ववर्ती बाध्यता एक ऋण की प्रकृति की है -
- ऐसे वाद दो वर्गों में विभाजित किए जा सकते हैंः-
(1) वसीयत संपत्ति द्वारा ऋण की तुष्टि।
(2) एक दाय भाग के द्वारा ऋण की तुष्टि।
वसीयत संपत्ति द्वारा ऋण की तुष्टि
यह वाद वहां उद्भूत होता है जहां एक ऋणी की सूचना के बिना वसीयत संपत्ति के जरिए एक धनराशि की वसीयत अपने महाजन के हक में करता है। प्रश्न हैः क्या वसीयत संपत्ति ऋण का निस्तारण करने वाली के रूप में ली जानी है या साहूकार वसीयत संपत्ति और ऋण के लिए भी हकदार है?
नियम - वसीयत संपत्ति ऋण की तुष्टि करने वाली मानी जाएगी।
नियम की सीमाएं - यह नियम निम्न दशाओं में लागू नहीं होता हैः-
(i) जहां वसीयत संपत्ति ऋण से कम धनराशि की है कोई तुष्टि उस सीमा तक नहीं।
(ii) जहां वसीयत संपत्ति आकस्मिकता पर दी जाती है।
(iii) जहां वसीयत संपत्ति अनिश्चित धनराशि की होती है जैसे अवशेष
(iv) जहां वसीयत संपत्ति की अदायगी के लिए नियम समय उससे जिस पर ऋण देय हो जाता है से भिन्न है - इस प्रकार कि साहूकार के लिए समानतः लाभदायक हो।
(v) जहां वसीयत संपत्ति की विषय-वस्तु ऋण से भिन्न है जैसे भूमि।
2. दाय भाग द्वारा ऋण की निष्तारण तुष्टिः
(1) इस प्रकार का वाद वहां उद्भूत होता है जहां पिता अपने बच्चे का ऋणी हो जाता है और तब एक दाय भाग अपने जीवनकाल में उसके लिए अग्रिम के रूप में देता है। प्रश्न हैः क्या बच्चा दोनों का दावा कर सकता है - ऋण एवं दाय भाग? या दाय भाग द्वारा ऋण की तुष्टि हो जाती है?
(2) नियम-दाय भाग के द्वारा ऋण की तुष्टि हो जाती है।
(3) यह नियम उन्हीं सीमाओं के अधीन है।
(5) पालन और तुष्टि में अंतर (आगे के टिप्पण उपलब्ध नहीं हैं - संपादक)
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