2. डोमिनियन प्रस्थिति पर टिप्पणी - Page 293

276 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

डोमिनियन (अधिराज्यीय) प्रस्थिति का विकास

  1. सबसे पहले साम्राज्यिक संसद एवं शासन द्वारा असीमित प्रभुसत्ता का दावा है जिसका उल्लेख लॉर्ड जोन रसेल द्वारा तार्किक परिपूर्णता में किया गया है।

  2. दूसरे औपनिवेशिक स्वायत्तता का दावा जो एक प्रभावी भाग है कि अपने हित के विषयों में उपनिवेशों को अपना काम काज चलाना चाहिए।

  3. तीसरे दोनों के बीच असंगति। एक स्वशासी आश्रित राजा के पदों में विरोधाभास।

समाधान

एक ओर साम्राज्यिक संसद एक उपनिवेश को क्रियाकलाप का एक क्षेत्र प्रदान करती है जिसमें औपनिवेशिक विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका को शासनिक शक्ति का प्रयोग करने का प्राधिकार होता था। इस क्षेत्र में उपनिवेश संप्रभु होता था।

दूसरी ओर, साम्राज्यिक संसद को जब कभी वह ठीक समझती थी। विहित की शक्ति को प्रायोगित करने के उपनिवेश के अधिकारों को या तो उस उपनिवेश में कांस्टीट्यूट एक्ट का निरसन या संशोधन करके, अथवा उपनिवेश की अधिकारिता के अंतर्गत किसी प्रजा पर स्पष्टतः लागू होने वाले साम्राज्यिक अधिनियम को पारित करके वापस करने या सीमित करने को पूर्ण विधिक शक्ति और प्राधिकार था।

दो प्रश्नः (1) औपनिवेशिक एवं साम्राज्यिक प्राधिकारों के बीच प्राधिकार का विभाजन कैसे होना था? (2) प्रत्येक को दी गई शक्तियों के प्रयोग करने की पद्धति।

(1) प्रस्तावित विभाजन साम्राज्यिक एवं औपनिवेशिक विधायी क्षमता के अनुकूल नहीं था।

एकल विद्यमान औपनिवेशिक क्षमता में होना था किंतु उनमें से कोई साम्राज्यिक प्राधिकारी द्वारा निषेधादेश के प्रति उत्तरदायी इस आधार पर नहीं होगा कि वह औपनिवेशिक विधायी क्षमता के बाहर था, वरन् इसलिए वह किसी विनिर्दिष्ट साम्राज्यिक हित को प्रभावित करता था।

(2) यह वकालत की जाती थी कि साम्राज्यिक चिंता के संभव विषयों उन विषयों को जो साम्राज्यिक चिंता के समझे जाते थे प्रमाणित करके लेखबद्ध होने चाहिए। ब्रिटिश शासन ने विशेषतः इस तरीके से स्वयं को आबद्ध करना अस्वीकार कर दिया और वे प्रावधान ऑस्ट्रेलियन विधेयक में रखे जाने के लिए अनुज्ञात नहीं किए।

(3) औपनिवेशिक एवं साम्राज्यिक प्राधिकारियों के क्रियाकलाप किस प्रकार समायोजित एवं समन्वित होने थे ताकि विभ्रम, अति व्याप्ति एवं मतभेद से बचाया जा सके। इसका समाधान निम्नलिखित में पाया गया थाः-