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(5) इसमें (यदि कोई हो) अपराध एवं भा.दं.सं. या अन्य विधि की धारा जिसके
अधीन अभियुक्त सिद्ध दोष किया गया है, और दंड जिसके लिए दंडादेशित
किया गया है का स्पष्ट विवरण होगा।
(6) जब दोष सिद्धि भा.दं..सं. के अधीन है और यह संदेहास्पद है कि उस संहिता
को एक ही धारा के दो भागों में से किस भाग के अधीन अपराध आता है तो
न्यायालय प्रत्यक्ष रूप से उसको अभिव्यक्त करेगा और वैकल्पिक निर्णय देगा।
(7) यदि अभियुक्त दोषमुक्त किया जाता है तो ह उस अपराध का विवरण देगा
जिससे उसे दोषमुक्त किया गया है और निर्देशित करेगा कि वह स्वतंत्र किया
जाए।
(8) यदि अभियुक्त मृत्यु दंड के अपराध के लिए दोषसिद्ध होता है और न्यायालय
उसको मृत्यु से भिन्न दंड के लिए दंडादेशित करता है तो न्यायालय ये कारण
देगा परन्तु जूरी द्वारा विचारण में न्यायालय को निर्णय लिखने की आवश्यकता
नहीं है किन्तु सेशन न्यायालय आरोप के शीर्ष को अभिलिखित करेगा।
धारा 368
जब मृत्यु का दंडादेश हो - दंडादेश यह निर्देशित करेगा कि वह तब तक गर्दन से लटकाया जाए जब तक मर न जाए।
धारा 369
निर्णय का परिवर्तन
संहिता या अन्य विधि या उच्च न्यायालय के विषय में अन्यथा उपबंधित के सिवाए कोई भी न्यायालय लिपिकीय गलतियों को सही करने के अतिरिक्त जबकि निर्णय पर हस्ताक्षर हो चुके हैं, उसे परिवर्तित या पुनर्विलोकित नहीं करेगा।
उच्च न्यायालय को भी कोई शक्ति नहीं है।
धारा 370
प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट द्वारा निर्णय
उपरोक्त में निर्णय अभिलिखित करने के स्थान पर प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट निम्नलिखित विवरणों को अभिलिखित करेगा -
(अ) क्रम संख्या
(ब) अपराध करने का दिनांक
(स) परिवादी (यदि कोई हो) का नाम
(द) अभियुक्त का नाम (यूरोपीय ब्रिटिश जनता के विषय के अतिरिक्त) उसके
माता-पिता एवं निवास।
(ई) परिवादित या सिद्ध अपराध।