परिचयात्मक - Page 302

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अतिक्रमण किया गया है, को अनुपज्ञात करती है, प्रभेदित करने से भली प्रकार समझा जा सकता है।

  1. कोई अधिकार तभी हो सकता है जब उसके साथ कोई उपचार भी हो। कोई अधिकार संरक्षण नहीं दे सकता यदि उसके प्रति समर्थन के लिए किसी उपचार का उपबंध नहीं है। अतः अधिकार के उल्लंघन के लिए विधि अतिकर्मतः उपचार का उपबंध करती है।

  2. अधिकार के उल्लंघन के लिए विधि द्वारा उपबंधित सामान्य उपचार धनीय क्षतिपूर्ति है जिसे प्रतिकार या नुकसानी कहते हैं।

  3. धनीय क्षतिपूर्ति का उपचार सभी वादों में एक यथेष्ट उपचार नहीं है। किसी वस्तु की हानि, धन देकर पूरी नहीं हो सकती है। अन्यों की हानि की धन से पूर्ति नहीं हो सकती है। उनकी हानि ठीक उसी वस्तु की वापसी से पूरी हो सकती है। उसी प्रकार किसी बाध्यता का पालन करने में इंकारी धन से पूरी हो सकती है। अन्य वादों में मात्र यथेष्ट उपचार ठीक उसी बाध्यता के पालन को बाध्य करना है।

  4. इस प्रकार विधि में दो प्रकार के उपचार उपबंधित हैंः-

(अ) वे जिनके अंतर्गत वादकर्ता को ठीक वहीं चीजें मंजूर की जाती हैं जिनके लिए वह उस अधिकार के कारण हकदार है वह अपने विरोध के विरुद्ध अर्जित कर चुका है, और

(ब) वे जिनके अंतर्गत वादकर्ता को ठीक वही वस्तु प्रदान नहीं की जाती जिसके लिए वह हकदार था, वरन् उसके बदले में धनीय प्रतिकार या नुकसानी।

  1. विनिर्दिष्ट अनुतोष प्रथम प्रकार के उपचार का नाम है।

  2. अनुतोष विनिर्दिष्ट कहा जाता है क्योंकि यह विशिष्ट वस्तुओं में अनुतोष है अर्थात् उसी वस्तु के रूप में जिसके लिए वादकर्ता हकदार है।

IV. विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम में क्या-क्या विनिर्दिष्ट अनुतोष उपबंधित हैं

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम में उपबंधित विनिर्दिष्ट अनुतोषों के रूप चार खंडों में आते हैंः-

(1) संपत्ति को कब्जे में लेना और उसे दावेदार को देना जो कब्जे से बाहर है।

(2) संविदा के पालन की अपेक्षा करना।

(3) संविधिक कर्त्तव्य के पालन को बाध्य करना।

(4) अविधिक कार्य को किए जाने से रोकना।