अधिनियम द्वारा मान्य - Page 306

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(ii) यह आवश्यक नहीं है कि विधिक स्वामी के पास धारा 10 के अधीन वाद चलाने का अधिकार रखने के लिए संपत्ति में लाभकारी हित भी अवश्य हो।

(iii) प्रथम स्पष्टीकरण में यह स्पष्ट कर दिया गया है, जहां एक न्यासी न्यास संपत्ति कब्जे के लिए वाद करने के लिए अनुज्ञात है यद्यपि उसमें उसका कोई लाभकारी हित नहीं है।

  1. स्वामित्व के स्वतंत्र कब्जे का हक।

स्वामित्व से स्वतंत्र कब्जे का हक दो प्रकार से उद्भूत हो सकता हैः

(i) स्वामी के कार्य द्वारा।

(ii) स्वामी के कार्य से अन्यथा।

(iii) स्वामी के कार्य द्वारा कब्जे का हक -

(i) स्वामी अपने कार्य द्वारा दूसरे व्यक्ति में एक वस्तु का जो स्वामी के रूप में उससे संबंधित है कब्जा लेने का अधिकार सृजित कर सकता है।

(ii) ऐसे कब्जे के अधिकार के दृष्टांत उपनिधान एवं धारणाधिक में पाए जाते हैं -

(1) साधारण उपनिधान में ये मामले आते हैं -

(i) ऋण

(ii) अभिरक्षा

(iii) वहन

(iv) अभिकरण

(2) अन्य उपनिधान

(i) धरोहर

(ii) भाड़ा

  1. साधारण उपनिधान एवं धरोहर या भाड़े के अन्य उपनिधानों में अंतरः-

(i) साधारण उपनिधान में स्वामी (उपनिधाता) का कब्जे का अधिकार होता है और उपनिहिती का विधिक कब्जा होता है। उपनिहिती कब्जे का हक होते हुए कब्जे के प्रत्युद्धरण के लिए वाद चला सकता है। उपनिधाता भी कब्जे का अधिकार रखते हुए उपनिहिती से भिन्न किसी व्यक्ति के विरुद्ध कब्जे की प्राप्ति के लिए वाद चला सकता है।

(ii) धरोहर या भाड़े अन्य उपनिधानों में - उपनिधाता को कब्जे का अधिकार नहीं होता है। कब्जे का अधिकार उपनिधान काल में धरोहरदार अनक्रेता में