290 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
सन्निविष्ट होता है और वह केवल उपनिहिती धरोहरदार अनक्रेता ही है, जो कब्जे के प्रत्युद्धरण के लिए वाद चला सकता है।
- धारणाधिकार, स्वामी के कार्य से उद्भूत कब्जे के अधिकार का एक दृष्टांत है -
(1) धारणाधिकार वस्तु के कब्जे का अधिकार है जो स्वामी द्वारा देय ऋण से उद्भूत होता है।
(2) स्वामी का कब्जे का अधिकार इस प्रकार अस्थाई रूप में एक अन्य (व्यक्ति) में सन्निविष्ट होता है।
- वाद चलाने के लिए आवश्यक है वर्तमान कब्जे का अधिकार -
(i) वर्तमान कब्जे का अधिकार स्वामित्व से उद्भूत हो सकता है या नहीं हो सकता है।
(ii) वर्तमान कब्जे का अधिकार विशेष या अस्थाई हो सकता है।
(2) कब्जे का अधिकार स्वामी के कार्य से अन्यथा -
(1) खोए माल को पाने वाला कब्जे का अधिकार रखता है।
(2) यह स्वामी के कार्य का परिणाम नहीं है।
(3) वरन् वह स्वामी के अतिरिक्त समग्र विश्व के विरुद्ध सही है।
II. ऐसा वाद जिसके विरुद्ध वाद चलाया जा सकता है -
(1) धारा 10 के अधीन वाद किसी एक (व्यक्ति) के विरुद्ध चलाया जा सकता है और यहां तक कि वास्तविक स्वामी के विरुद्ध भी चलाया जा सकता है।
(2) आवश्यक यह है कि वादी कब्जे का हक अवश्य रखता हो।
धारा- 11 जंगम संपत्ति
- प्र. 1 - धारा 11 के अधीन कौन वाद चला सकता है?
उ. - तत्काल कब्जे का हकदार व्यक्ति।
- प्र. 2 - इस प्रकार का वाद किसके विरुद्ध चलाया जा सकता है?
उ. - हर एक के विरुद्ध यदि वह स्वामी नहीं है।
प्रतिवादी स्वामी न हो। यदि है, तब धारा 10 लागू होगी।
- प्र. 3 - किस वाद में कब्जे के प्रत्युद्धरण के द्वारा विशिष्ट विनिर्दिष्ट अनुतोष होगा?
उ. - जहां व्यक्ति जो वस्तु धारण करता है दावेदार का न्यासी या अभिकर्ता है।