291
(ii) जहां क्षति के लिए दावेदार के लिए धनीय प्रतिकार उपयुक्त प्रतिकार नहीं हो।
(iii) जहां वस्तु की हानि से उत्पन्न नुकसान को निश्चित करना नितांत कठिन है।
(iv) जहां व्यक्ति का कब्जा दावेदार से सदोष अंतरण का परिणाम है।
संपत्ति के कब्जे के संबंध में विनिर्दिष्ट अनुतोष
वे धारा 8-11 में दिए गए हैं।
धारा 8 - विनिर्दिष्ट स्थावर संपत्ति का उसके कब्जे के हकदार व्यक्ति द्वारा प्रत्युद्धरण।
धारा 9 - विनिर्दिष्ट स्थावर संपत्ति का कब्जे का प्रत्युद्धरण ऐसे व्यक्ति द्वारा जो बेकब्जा किया जाता है।
धारा 10 - विनिर्दिष्ट जंगम संपत्ति का उसके कब्जे के हकदार व्यक्ति द्वारा कब्जे प्रत्युद्धरण (1) स्वामित्व के कारण (2) अस्थाई या विशेष अधिकारों (न्यासी) उपनिधान पण्यम् के कारण।
धारा 11 - विनिर्दिष्ट स्थावर संपत्ति वे, ऐसे व्यक्ति द्वारा जो उसके तत्काल कब्जे का हकदार है कब्जे का प्रत्युद्धरण।
विधि में कब्जे से क्या अभिप्रेत है?
विधिक कब्जा दो अवयवों का यौगिक हैः काय एवं आधिपत्य का आशय
टिप्पणीः-
(i) विधिक कब्जा हक या अधिकार के तत्त्व से वहां बनता है।
विधिक कब्जा अधिकार या हक के स्वतंत्र होता है। विधिक कब्जा विधिपूर्ण या अविधिपूर्ण हो सकता हैं
यदि कोई कब्जा धारक अपना वास्तविक कब्जा विधि द्वारा मान्य (न्यायिक औचित्य) अर्जन के साधनों से अर्जित करता है तो वह विधिपूर्ण कब्जा रखता है। यदि उसने उसको इस प्रकार अर्जित नहीं किया (जैसे कि एक चोर की दशा है तो वह विधिक कब्जा तो रखता है किंतु वह अविधिपूर्ण कब्जा है।
(ii) विधिक कब्जा दोषकर्ता से रक्षित होने वाले व्यक्तिगत अधिकार से अधिक प्रदान करता है। वह कब्जा का विशेषित अधिकार संपत्ति की प्रकृति में एक अधिकार प्रदान करता है, जो हर एक व्यक्ति जो उसके पूर्व का और श्रेष्ठतर हक नहीं दिखा सकता है के विरुद्ध विधिमान्य है। विधिक कब्जे में दो तत्त्व होते हैंः-