अधिनियम द्वारा मान्य - Page 309

292 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

(i) कार्य अर्थात् भौतिक संबंध।

(ii) आशय अर्थात् मानसिक संबंध।

कार्य या भौतिक संबंध का अभिप्राय भौतिक संपर्क मात्र इसके अंतर्गत भौतिक संपर्क भी है जिसे जब चाहे ग्रहण किया जा सके। कार्य का सार वस्तु के उपयोग से अन्यों को अपवर्जित करने की शक्ति है। अर्थात् सकब्जा वस्तु की प्रकृति के अनुसार प्रभावी अधियोग या नियंत्रण।

आशय अन्यों को अपवर्जित करते हुए और वस्तु के साथ सहर्ष व्यवहार करने की ऐसी शक्ति का प्रयोग करने का आशय है।

आशय के तीन रूप

अपने कब्जे की वस्तु के संबंध में भौतिक काबिज की मानसिक मनोवृत्ति की तीन डिग्रियां हो सकती हैंः-

(i) उसका आशय वस्तु की सुरक्षा करने का हो सकता है। अधिकार का प्राख्यान नहीं। मालिक के सामान पर नौकर का कब्जा।

(ii) कुछ सीमित प्रयोजनों के लिए नियंत्रण करने का आशय - अर्थात् किराएदार स्वामी के अतिरिक्त हरेक को अपवर्जित करने का आशय।

(iii) हर एक अन्य व्यक्ति के अधिकार की इन्कारी के समान आशय। यह वास्तविक आधिपत्य का आशय है।

कब्जा एवं अतिचार में अंतर

इस प्रकार के वादों में वादी को जो सिद्ध करना है वह है विवादित संपत्ति का कब्जा न कि केवल उस संपत्ति पर अतिचार के पृथक कार्य। वह अवश्य सिद्ध करे -

(i) कि उसने ऐसे कार्य किए जो आधिपत्य के समान थे, आधिपत्य के इन कार्यों की प्रकृति संपत्ति की प्रकृति के साथ-साथ भिन्न-भिन्न होती है।

(ii) यह कि आधिपत्य का वह कार्य अनन्य था।

  1. यदि वादी का अधिभोग जैसा कि उन कार्यों से इंगित था शांतिपूर्ण एवं अविच्छिन हुआ है और पर्याप्त दीर्घ समय तक चला है तो निष्कर्ष निकालना उचित होगा कि वादी का कब्जा था।

धारा 8 एवं 9 के उद्देश्य

(i) अधिनियम की धारा 8 उपबंध करती है कि विनिर्दिष्ट स्थावर संपत्ति के कब्जे के लिए हकदार व्यक्ति सिविल प्रक्रिया संहिता में निर्धारित रीति से कब्जे का प्रत्युद्धरण कर सकता है - अर्थात् हक के आधार पर बेदखली का वाद लाकर।

(ii) धारा 9 इस व्यक्ति को जो उसकी संपत्ति के बिना स्थावर संपत्ति से विधि के अनुसार से अन्यथा बेकब्जा किया जाता है, हक सिद्ध किए बिना कब्जे के प्रत्युद्धरण