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के लिए संक्षिप्त उपचार प्रदान करती है।
धारा 9
यह धारा अवैध बेकब्जा किए जाने के विषय के बारे में और बेकब्जा व्यक्ति को दो वैकल्पिक उपचार प्रदान करती हैः-
(i) वह अपने अवैध बेकब्जा किए जाने के तथ्य का, उसके छः माह के अंतराल में उसके द्वारा प्रस्तुत वाद में साधारणतः सिद्ध कर सकता है और संपत्ति के कब्जों पर कर सकता है।
(ii) वह उसी उद्देश्य से अपने द्वारा लाए गए वाद में अपने हक पर निर्भर करते हुए कब्जों पर कर सकता है। यहां उसकी सफलता उसके हक के सबूत पर निर्भर करती है।
पहला उपचार कब्जे के वाद के रूप में उपचार कहलाता है और धारा 9 में अधिनियमित है दूसरा हक पर आधारित वाद का एक साधारण उपचार है और धारा 8 में लेखबद्ध है।
धारा 9 की प्रकृति एवं उद्देश्य
(i) लोगों को अपने हाथ में विधि को लेने से रोकना, उनका हक भले ही कितना भी अच्छा हो।
(ii) बेकब्जा के कारण सबूत के भार को दूसरे पर डालने से रोकना हक प्रथम दृष्टया है।
धारा 9 के अधीन वाद में अर्थात् कब्जा छीनने के छः माह के भीतर बेकब्जा एवं बेकब्जा कर्ता के बीच पूर्ववर्ती कब्जा स्वतः संपत्ति में परिपूर्ण हक गठित करता है।
प्रश्न - ऐसे व्यक्ति द्वारा जो छः माह व्यतीत हो जाने पर कब्जाहीन है, और धारा 9 के अधीन वाद लाना वर्जित है, कब्जे के लिए लाए गए वाद में पूर्ववर्ती कब्जे का क्या प्रभाव है?
निम्नलिखित प्रतिपादिताएं न्यायिक रूप से स्थापित की गई हैंः-
(i) साठ वर्ष एवं इससे अधिक समय तक कब्जा कब्जेदार व्यक्ति में हक सृजित करने के लिए पर्याप्त है, जिस पर कोई उंगली नहीं उठा सकता। 1-8 डी.आर. 386
(ii) अनुच्छेद 142 के अधीन 12 वर्ष का हक प्रतिकूल कब्जा स्वयं साधिकार स्वामी के विरुद्ध भी हक होता है।
फलतः जहां कब्जे के एक वाद में प्रतिवादी द्वारा निर्धारित सीमाकाल में प्रतिकूल कब्जे का तर्क स्थापित कर दिया जाता है वहां परिसीमा का प्रश्न हक का प्रश्न हो जाता है और वादी को प्रथम दृष्टया अपने वाद के दिनांक पर अपने हक के बने रहने का सबूत प्रतिकूल कब्जे को स्थापित करने के लिए प्रतिवादी से अपेक्षा किए जाने से पूर्व प्रस्तुत कर देना चाहिए।