296 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
(4) संविदाएं जो अपने स्वभाव में खंडनीय हैं जैसे बिना कार्यकाल की भागीदारी।
(5) संविदाएं जो न्यासियों द्वारा अपनी शक्ति या अपने विश्वास भंग में की जाएं।
(6) संविदाएं जो कंपनी द्वारा उसकी शक्ति से अधिक हो।
(7) संविदाएं जिनके पालन में उसके दिनांक से 3 वर्षों से अधिक लंबी अवधि तक निरंतर कर्त्तव्यपालन होना चाहिए।
(8) संविदाएं जिनकी विषय-वस्तु का तात्विक भाग जो दोनों पक्षों द्वारा अस्तित्वशील माना गया अस्तित्व में नहीं है।
(9) संविदाएं विवाद को मध्यस्थता के लिए भेजना।
टिप्पणीः- व्यावहारिक दृष्टि से विनिर्दिष्ट पालन क्योंकि दावा करने का अधिकार नहीं दिया गया है।
संविदाओं का विनिर्दिष्ट पालन
धारा 12
ऐसी चार स्थितियां हैं जिनमें विनिर्दिष्ट पालन लागू हो सकता है -
(i) जहां वायदाकृत कार्य न्यास के पालन में हैं।
(ii) जहां वास्तविक क्षति को निश्चित करने का कोई मानक नहीं है।
(iii) जहां नुकसानी उपयुक्त अनुतोष नहीं है।
(iv) अनुपालन के लिए प्रतिकार नहीं दिया जा सकता।
संविदा
एक करार के विनिर्दिष्ट पालन के वाद में न्यायालय द्वारा निश्चित किया जाने वाला प्रथम प्रश्न है - क्या प्रश्नगत करार संविदा है या नहीं। धारा-4 (क) अनुतोष जब तक कि करार संविदा नहीं है।
निम्नलिखित करार, संविदा नहीं है क्योंकि वे प्रवर्तन योग्य नहीं है, और इसलिए अपवर्जित किए जाते हैंः-
(i) अपूर्ण करार - भागीदार समझौता वार्ताओं से आगे नहीं गए हों।
(ii) करार जो शून्य है।
(iii) आकस्मिक करार - जब तक आकस्मिकता लागू नहीं है फ्उद्भूतय् होना चाहिए।
शून्यकरणीय संविदा अपवर्जित नहीं है।
न्यायालय के समक्ष एक संविदा हो जिसका पालन नहीं हुआ है।