297
परस्परता - विनिर्दिष्ट पालन निष्पादन रूप से उपचार परस्परतः होता है अर्थात् विक्रेता सभी स्थितियों में अपना वाद ला सकता है, जहां क्रेता विनिर्दिष्ट पालन के लिए निश्चित हो सकता है।
यह परस्परता का सिद्धांत स्थावर एवं जंगम दोनों के विषय में लागू होता है।
परस्परता का सिद्धांत - इसका अर्थ है कि संविदा करने के समय दोनों ओर से विचार या उभय पक्ष द्वारा परस्पर प्रदत्तनीय पालन का अभिलेख स्वीकृत नहीं किया जाएगा न एक अव्यस्क इस उपचार के द्वारा संविदा को प्रवर्तित कर सकता है। उसका वायदा उसके विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं है और यह कि न्यायालयों का केवल वहां हस्तक्षेप करना जहां परस्पर उपचार एक सामान्य सिद्धांत है।
धारा 13
संविदा का विनिर्दिष्ट पालन और पालन की असंभाव्यता। संविदा अधिनियम की धारा 56
धारा 56 खंड (2) सामान्य नियम अधिनियमित करती है। यह निर्धारित करती है कि कब संविदा शून्य हो जाती है।
यह नियम असंभाव्यता के हर एक आधार पर लागू होता है और इस धारणा पर आधारित है कि संविदा के सभी मानकों में एक विवक्षित शर्त होती है कि पालन संभव है।
संविदा के संबंध में असंभाव्यता।
(1) समय पर या (2) बाद में
भौतिक रूप से या संविदा की
विधिवत असंभव विषयवस्तु विद्यमान
नहीं।
पश्चात्वर्ती असंभाव्यता
क्या एक पक्ष अन्वेक्षण पर मुक्त किया जा सकता है, पश्चात्वर्ती असंभाव्यता इस पर निर्भर करती है -
(i) क्या संविदा सशर्त है या अशर्त है।
(I) यदि अशर्त - पालन अवश्य।
(II) यदि सशर्त - तीन परिस्थितियों में -
(i) निरंतर विधिकता -
(ii) व्यक्त शब्दों में सशर्त।