298 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय
(iii) प्रवर्तन द्वारा सशर्त - धारा 56 संविदा अधिनियम में वस्तु की विषय-वस्तु की निरंतरित विद्यमानता - संभाव्यता के पश्चात्वर्ती संविदा शून्य।
दो आधारों पर हो सकती हैः-
(i) करार की वस्तु भौतिकतः या विधिकतः असंभव है।
(ii) संविदा की विषय-वस्तु अविद्यमान है।
ऐसी असंभाव्यताएं हो सकती हैं या तो -
(1) प्रारंभिक या पश्चात्वर्ती
यदि असंभव संविदा शून्य है और विनिर्दिष्ट पालन कोई प्रश्न नहीं है तो क्या असंभाव्यता प्रारंभिक या पश्चात्वर्ती है।
धारा 13 - विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, अधिनियम की धारा 56 एक अपवाद असंभाव्यता के संबंध में अर्थात् विषय-वस्तु की अविद्यमानता के कारण असंभाव्यता।
धारा 13 बताती है कि संविदा का विनिर्दिष्ट पालन प्रवर्तित कराया जा सकता है हालांकि विषय-वस्तु आंशिकतः विनष्ट है।
मकान का विक्रय - चक्रवाद - बवंडर द्वारा विनष्टता - क्रेता पालन के लिए बाध्य किया जा सकता है।
धारा - 13 एक अपवाद अधिनियमित करती है।
यह एक ऐसी स्थिति के बारे में है जहां विषय-वस्तु का एक भाग विद्यमान नहीं रहता है।
संक्षिप्ततः नियम इस प्रकार है -
क्योंकि अ विशेष अपरिहार्य परिस्थितियों के होते हुए अपना वायदा पूरा करने में असमर्थ है यह कोई कारण नही है, अपने (वायदे) को क्यों पूरा न करे, विशेषतः जैसे कि वह स्वयं को अ के पालन पर अपने वायदे के पालन को सशर्त बना कर संरक्षित करे। एक अविशेषित वायदा करके उसे वह अवश्य पूरा करे।
संविदा के एक भाग का विनिर्दिष्ट पालन
क्या न्यायालय संविदा के एक भाग के पालन की डिक्री दे सकता है?
यह प्रश्न धारा 14-17 में देखा गया है।
धारा 17 सामान्य नियम अधिनियमित करती है। यह वर्णित करती है कि न्यायालय सामान्य नियम के रूप में जब तक कि वह समग्र संविदा का विनियोजन नहीं कर सकता संविदा के विनिर्दिष्ट पालन को बाध्य नहीं करेगा। विनिर्दिष्ट पालन समग्र का हो या कुछ भी नहीं।