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धाराएं 14, 15, 16 नियम के अपवाद हैं।
अपवादः उपक्रमित किए गए वायदे - विभाज्य या अविभाज्य हो सकते हैं।
(I) विभाज्य वायदे अर्थात् वायदे - एक भाग दूसरे एक भाग से एक पृथक और स्वतंत्र आधार पर संबद्ध होता है। यदि पूर्ववर्ती का विनिर्दिष्ट पालन हो सकता है या हो सकता था तो इसका पालन इस प्रकार किया जाएगा, यद्यपि परवर्ती का विनिर्दिष्ट पालन नहीं हो सकता है या निश्चित नहीं हो सकता है - धारा 16
(II) अविभाज्य वायदे - (वह) भाग जिसका पालन किया जा सकता
(i) धनीय प्रतिकार स्वीकार करना।
(ii) यह नहीं हो सकता।
(अ) प्रतिकार की स्वीकृति - दो स्थितियों में -
यह वहन कर सकता है -
(1) समग्र वचन का एक छोटा भाग।
(2) समग्र उपक्रम का एक बड़ा भाग।
यदि (1) वह छोटा भाग वहन करते हैं तब एक पक्ष दोनों के विनिर्दिष्ट पालन के लिए वाद ला सकता है और प्रतिकार के लिए किसी का नहीं। धारा 14
यदि (2) वह बड़े भाग को वहन करता है, तब वायदी शेष भाग के विनिर्दिष्ट पालन के लिए वाद ला सकता है, यदि वह आगे निष्पादन के सभी दावों और नुकसानी के सभी अधिकारों को त्याग देता है।
(ब) जो भाग जिसका पालन नहीं किया जा सकता प्रतिकार को स्वीकृत नहीं करता तब वायदी शेष भाग के विनिर्दिष्ट पालन का वाद ला सकता है, यदि वह आगे निष्पादन के सभी दावों और नुकसानी के प्रति सभी अधिकारों को त्याग देता है - धारा 15
दृष्टांतः- अ ब को एक घर एवं संपदा के साथ एक लाख रुपए में बेचने की संविदा करता है। घर के उपभोग के लिए उद्यान महत्त्वपूर्ण है। यह विदित होता है कि अ बाग का हस्तांतरण करने में असमर्थ है।
क्या ब संविदा का विनिर्दिष्ट पालन करा सकता है? - हां, यदि ब सहमत मूल्य अदा करने और संपदा को लेने और बिना उद्यान के घर को लेने या तो कमी के लिए या अ की अवहेलना या उपेक्षा के लिए अपनी हानियों के लिए प्रतिकार के सभी अधिकारों को छोड़ देने का इच्छुक है।
इस प्रकार नियम के चार अपवाद है -
(1) जहां भाग विभाजनीय है - एक भाग का विनिर्दिष्ट पालन डिक्री हो सकता है। यद्यपि सभी भागों का नहीं - धारा 16