अध्याय - VIII
लोक प्रशांति के विरुद्ध अपराधों से
संबंधित है।
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न्यायालय लोकाचार के निवारक या पूर्वाभासी कार्यों के लिए निम्नलिखित प्रथा को अनुध्यात करता हैः-
(1) संसार में हर एक देश में झगड़ालू लोग हैं और कुछ झगड़े तो ऐसे हैं जो हिंसा
और गंभीर अपराध की ओर भी ले जाते हैं।
(2) इसी प्रकार प्रचार की कुछ शैलियां यदि बेरोकटोक की जाएं तो अबोध व्यक्तियों
को हानिकारक बातें करने को प्रेरित कर सकती हैं, वे असत्यों को परिचालित कर
रही हो सकती हैं, या अत्यधिक भयानक अर्ध सत्यों का भी अबोध व्यक्तियों को
विश्वास कराके विश्वास पर कार्य कराने के दोषपूर्ण षड्यंत्र का आनंद लिया जा
रहा है जिसका आनंद वस्तुतः किसी के द्वारा नहीं लिया जाता है।
(3) यहां वे लोग भी हैं जो ईमानदारी के काम के बजाए प्रमोद के जीवन को अधिक
पंसद करते हैं, कभी-कभार अपराध भी पता लगाना असंभव प्रतीत होता है। ऐसे
भी व्यक्ति हैं जो स्वयं अपने द्वारा किए गए अपराध की आय पर रहते हैं या
दूसरों द्वारा किए गए अपराध की कमाई के अंश पर जीवित रहते हैं, जिनकी
वे पकड़े जाने से बचने में सहायता करते हैं या उनकी सहायता एक संगठन बना
कर करते हैं जो अपने समर्थकों को उनकी बेईमानी की कमाई को ठिकाने लगाने
का सुअवसर या दंड से मुक्ति की अच्छी संभावना प्रदान करते हैं।
(4) आभ्यासिक अपराधी।