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रखा, उसकी अपनी सनक तरंग मात्र से अधिक अविरत एवं अक्षयशील थी। एक दृढ़कारी प्रक्रिया चल पड़ती है। 1676 तक हम लॉर्ड नटिंघम को इस अवधारणा का अभिव्यक्त रूप से खंडन करते हुए पाते हैं कि चांसलर का अंतःकरण नैसर्गिक अंतश्चेतना मात्र है और 1818 में लॉर्ड सेल्डन साम्या न्यायाधीश के लिए मात्र व्यक्तिगत विवेकाधिकार के किसी भी विचार को संक्षिप्तः खंडित करते हैं। साम्या अंतःकरण की एक स्थिर प्रणाली है।
चांसलर के प्राधिकार की सीमाएं
अनुतोष प्रदान करने वाले इस परमाधिकार की कुछ सीमाएं थींः-
(1) इसका प्रयोग केवल वहां किया जा सकता था जहां विधि ने कोई अधिकार नहीं दिया था किंतु जहां अंतःकरण अपेक्षा करता था कि कुछ अधिकार दिए जाने चाहिए - यह साम्या की अनन्य अधिकारिता के रूप में जानी जाती थी।
(2) इसका प्रयोग केवल वहां किया जा सकता था जहां विधि ने अंतःकरण द्वारा उपेक्षित अधिकार दिए, किंतु इसने जो उपचार (उपाय) दिए वे न्याय की पूर्ति के लिए अपर्याप्त थे - यह साम्या की समवर्ती अधिकारिता के रूप में जानी जाती थी।
(3) इसका प्रयोग इन मामलों में किया जा सकता था जिनमें विधि ने अंतःकरण द्वारा अपेक्षित अधिकार न्याय के लक्ष्य की पूर्ति करने वाले पर्याप्त उपचार दिए किंतु जिसकी प्रक्रिया बिना साम्या की सहायता के उपचार प्राप्त करने के लिए अत्यधिक दोषपूर्ण थी - यह साम्या की सहायक अधिकारिता के रूप में जानी जाती थी।
साम्यिक अधिकार की प्रवृत्ति
साम्यिक अधिकार की प्रवृत्ति भली प्रकार समझी जाएगी जब इसका अध्ययन नैतिक एवं विधिक अधिकार की तुलना में किया जाए। मात्र परिभाषा का उपयोग नगण्य होगा।
प्रस्तावना के तौर पर हम अधिकार की एक निश्चित संकल्पना प्राप्त करने की चाह तो प्रारंभ कर सकते हैंः-
(i) यदि कोई व्यक्ति आग्रह विनय में अपनी इच्छाओं को क्रियान्वित कर सकता है तो वह इस प्रकार अपनी इच्छाओं को कार्यान्वित करने की शक्ति रखता है।
(ii) यदि इस शक्ति के रखने के बावजूद उसकी इस प्रकार अपनी इच्छाओं को कार्यान्वित किए जाने की लोकमत अनुमोदन या उप-मति की दृष्टि से देखेगा और उसके ऐसा करने में किसी व्यवधान को अनुमोदन के साथ देखेगा तो अपनी इच्छाओं को इस प्रकार क्रियान्वित करने का उसे नैतिक अधिकार है।
(iii) यदि लोकमत की स्वीकृति या अस्वीकृति, उपमति या उपमतिहीनता