सामान्य विधि - Page 327

310 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

के बावजूद राज्य उसकी इच्छाओं के इस प्रकार कार्यान्वयन का समर्थन करेगा तो उसको इस प्रकार अपनी इच्छाओं को कार्यान्वित करने का विधिक अधिकार प्राप्त है।

  1. क्या यह शक्ति का प्रश्न है यह बल या आग्रह मनुष्य की शक्ति पर निर्भर करता है। क्या यह नैतिक अधिकार का प्रश्न है, यह उसके पक्ष में लोकमत की अपनी अभिव्यक्ति की तत्परता पर निर्भर करता है। क्या यह विधिक अधिकार का प्रश्न है तो उसके पक्ष में राज्य द्वारा उसकी शक्तियों को प्रायोजित किए जाने की तत्परता पर निर्भर करता है। विधिक अधिकार वहीं अस्तित्व में आता है जहां संगठित समाज जिसे राज्य कहा जाता है के द्वारा कार्रवाई की एक प्रक्रिया को प्रवर्तित किया जाता है और दूसरी को निषिद्ध किया जाता है। अतः विधिक अधिकार एक हित है जो राज्य द्वारा मान्य एवं संरक्षित किया जाता है। अधिकार जिसका कोई भी हित हो उसका सम्मान करना एक कर्त्तव्य है और उसकी अवहेलना करना अपराध।

विधिक अधिकार की विशेषताएं

  1. विधिक अधिकार एक ऐसा अधिकार है जो नैतिक अधिकार से भिन्न राज्य द्वारा प्रवर्तित किया जाता है।

  2. विधिक अधिकार एक हक पर आधारित होता है जो विधिमान्य हकार्जनकारी प्रणालियों में से किसी एक द्वारा अर्जित किया हुआ दर्शाया गया हो, यथा कब्जा, चिरभोगाधिकार, करार एवं विरासत आदि।

  3. एक निहितात्मक तथ्य जो एक व्यक्ति में अधिकार के हक को सृजित करता है, दूसरे व्यक्ति में उसी अधिकार के हक को नष्ट करता है।

  4. विधिक अधिकार एक बाध्यता को सृजित करता है, जो या तो सर्वबंधी बाध्यता होती है या व्यक्तिबंदी बाध्यता।

किसी विषय में साम्यिक अधिकार विधिक अधिकार के समरूप होता है, किसी विषय में उससे भिन्न होता है।

  1. साम्यिक अधिकार, नैतिक अधिकार जैसा नहीं है, जो राज्य द्वारा प्रवर्तित नहीं किया जाता है। साम्यिक अधिकार विधिक अधिकार के अनुरूप है, क्योंकि यह राज्य द्वारा प्रवर्तित किया जाता है।

  2. साम्यिक अधकिर के हक का किसी एक मान्य ढंग द्वारा जिसके द्वारा विधिक अधिकार का हक सृजित किया जाता है, सृजित किया जाना आवश्यक नहीं है। यह सर्वाधिक महत्त्चपूर्ण अंतर है।

दृष्टांतः-

(i) भूमि का विधिक बंधक अवश्य ही एक विलेख द्वारा लिया जाना चाहिए। किंतु