सामान्य विधि - Page 329

312 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

करने एवं व्यवस्थित करने का एकांतिक अधिकार अर्जित कर लेता था।

उसके मृत्योपरांत उसकी (पत्नी की) व्यक्तिगत संपत्ति का जो पूर्णतः बेची नहीं गई थी और उसकी संपदा का आजीवन श्ुल्क अदा करने पर बशर्ते कि बच्चा जन्म ले चुका हो, सौजन्य से पूर्णतः हकदार हो जाता था।

  1. द्वितीयतः एक पति अपनी पत्नी को प्रत्यक्षतः अनुदान नहीं दे सकता था या उसके साथ कोई प्रसंविदा नहीं कर सकता था क्योंकि इन दोनों में किसी को एक बात की अनुमति देना उसके पृथक अस्तित्व को मान लिया जाना होता था।

  2. सामान्य विधि के अनुसार विवाह के परिणामस्वरूप पुरुष को उसकी पत्नी की संपत्ति का पूर्ण मालिक बनाना था और (पत्नी) को संविदिक सक्षमता से वंचित करना था।

  3. यदि संपत्ति एक विवाहित महिला को वचनों द्वारा दी जाती थी, जो या तो अभिव्यक्ततः या विवशता द्वारा इंगित करते थे कि उसे उस (संपत्ति) का उपभोग अपने एकांतिक एवं पृथक उपयोग के लिए करना है। साम्या ने उस संपत्ति को पति के नियंत्रण से उसे न्यासी (ट्रस्टी) के रूप में मानते हुए हटा दिया और पत्नी को उसके उपयोग एवं व्ययन की पूरी शक्ति प्रदान कर दी।

किंतु साम्या इससे और भी आगे निकल गई। उस खतरे को देखते हुए कि एक पति अपनी पत्नी को उसकी पृथक संपत्ति को बेचने और उसकी आय को उसे (पति को) देने के लिए अभिपे्ररित कर सकता था, उसने वैवाहिक व्यवस्थापनों में यह निवेशन, जो पूर्वादान पर प्रतिबंध के रूप में जाना जाता है, की अनुमति प्रदान कर दी। ऐसे प्रतिबंध, जो अब भी सामान्य है का प्रभाव यह था कि एक महिला जबकि वह आय के पूर्ण उपभोग को अपने पास रखती थी, अपने प्रत्याश्रय काल में समग्र संपत्ति को अन्य संक्रामित या भारित करने से रोक दी गई। वह उसको विक्ति कर सकती थी किंतु उसको बेच या रहन नहीं कर सकती थी। यह सामान्य विधिक का पूर्णतः उल्लंघन था। सामान्य विधिक से न केवल विवाह एक निहितात्मक तथ्य बन गया जो पत्नी की संपत्ति पर पति को हक देता था अपितु या तो पत्नी के साथ या किसी अन्य व्यक्ति के साथ कोई करार उसकी पत्नी की संपत्ति को धृत एवं अन्यसंक्रामित करने के अधिकार को नहीं छीन सकता था।

यह एक उदाहरण है जो दर्शाता है कि साम्यिक अधिकार, उससे बहुत भिन्न ढंग से उद्भूत होता है जिससे विधिक अधिकार उद्भूत होता है।

  1. विधिक अधिकार एवं साम्यिक अधिकार के बीच दूसरा भिन्नत्व इस प्रकार अभिरूपित किया जा सकता हैः-

  2. एक स्वामी में निहित विधिक अधिकार उसके पूर्ववर्ती स्वामी में निहित