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अधिकार को या तो भागतः या पूर्णतः नष्ट करता है। यह विनाश पूर्ण हो सकता है या आंशिक हो सकता है। यदि वह एक पट्टठ्ठा है तो वह आंशिक नष्ट होता है। यदि वह एक विक्रय है तो वह पूर्णतः नष्ट होता है। चाहे वह पूर्ण हो या आंशिक, वह विनाश है। जब यह कहा जाता है कि निहितात्मक तथ्य एक निर्निहात्मक तथ्य भी है तो उसका अभिप्राय यही है।
यह तब सत्य नहीं है, जब विधिक अधिकार एवं साम्यिक अधिकार के बीच प्रतिस्पर्धा होती है। साम्यिक अधिकार, विधिक अधिकार को तब भी नष्ट नहीं करता है जब वह एक विधिक अधिकार के स्वामी के विरुद्ध हो। एक विधिक एवं साम्यिक अधिकार के मध्य संघर्ष में, साम्यिक अधिकार विधिक अधिकार को नष्ट नहीं करता जैसा कि एक विधि अधिकार दूसरे विधिक अधिकार को करता है।
यह ऐसा क्यों है? इसके लिए यह जान लेना आवश्यक है कि किस प्रकार चान्सरी न्यायालय द्वारा एकदम प्रारंभ में ही साम्यिक अधिकार मान्य हो गया। यह ऐतिहासिक पृष्ठ भूमि संक्षेप में निम्नानुसार प्रस्तुत की जा सकती हैः-
(i) इंग्लैंड में नोरमन विजय से पूर्व एक व्यक्ति के लिए पृथकतः दूसरे व्यक्ति की ओर से - कोई कार्य करना एक सामान्य प्रचलन था। उदाहरण के लिए एक शेरिफ भूमि अधिग्रहीत कर लेता था और उन्हें अपने अधिप्रयोजनार्थ धारित करता था या जब भी कोई सरदार धर्मयुद्ध में बाहर जाता था तो वह अपनी पत्नी एवं बच्चों के प्रयोजनार्थ अपनी संपदा अपने मित्र को हस्तांतरित कर जाता था। फ्आपसय् शब्द धीरे-धीरे फ्यूजय् (प्रयोग) के रूप में बदल गया और अंतरित भूमि, उपयोग मेंं रखी भूमि कहलाने लगी।
(ii) अब यदि कुछ परिस्थितियों में कुछ व्यक्ति एक अन्य (व्यक्ति) के निमित्त या उपयोग के लिए भूमि का व्यवहार कर सकते थे तो अपरिहार्यतः मनुष्यों के सम्मुख प्रश्न उठा - क्या एक व्यक्ति द्वारा सामान्यतः दूसरे (व्यक्ति) के उपयोगार्थ भूमि को धारण किया जाना अनुज्ञात किया जाए। यह वस्तुतः ठीक ऐसा ही था जो कालांतर में किया गया था। काश्तकारों ने अपनी भूमि सामान्य विधि हस्तांतरण द्वारा ‘ब’ को हस्तांतरित की जिसने उसे ‘अ’ के निमित्त या सही पद को अपनाएं तो उसके उपयोग के लिए धारण करने का वचन दिया।
ऐसे विषयों में ‘ब’ उपयोगार्थ जागीरदार (फियाकी) कहलाया अर्थात् वह व्यक्ति जिसको कुछ शर्तों पर जागीरदार किया गया। जबकि ‘अ’ को अधिप्रयोजक ‘अगस्टिन क्यू यूज’ के रूप में जाना गया जिसका निर्वचन करने पर व्यक्ति अभिप्रेत था जिसके निमित्त भूमि धारित की गई।
(iii) जिन कारणों से यह प्रचलन आगे बढ़ा वे बहुत से हैं। कुल मिलाकर