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को जान लेना एक महत्त्वपूर्ण विचार बिंदु है। यह सामान्य विधि की दृष्टि से भूसंपत्ति के सभी संबंधों को उपयोग के अधिकारी व्यक्ति (सिस्टयू क्यू यूज) से विच्छेदित करना था। सामान्य विधि में पूर्ववर्ती हस्तांतरण द्वारा वह अपनी संपदा संप्रयोज्य जागीरदार (फिआकी) को उपयोगार्थ हस्तांतरित कर देता था और इसीलिए वह भूसंपत्ति पर सभी अधिकारों से वंचित हो जाता था। वह कुछ नहीं कहता था और फियाकी - संप्रयोज्य जागीरदार - सब कुछ होता था। वह प्रयोजनाधिकार सीसिन रखने के स्थान पर उस विश्वास पर भरोसा रखना ही ठीक समझता था जो उसने संप्रयोज्य जागीरदार पर किया था।
(ii) यदि संप्रयोज्य जागीरदार, उस पर अधिरोपित निदेशों का पालन करने में असफल होता या ऐसा करने से मना करता था, या यदि वह जानबूझकर भूसंपत्ति को अपने उद्देश्यों के लिए हस्तांतरित कर लेता था तो सामान्य विधि में ऐसी कोई कार्यवाही नहीं थी जिसके द्वारा दायित्वाधीन ठहराया जा सके।
(iii) यदि एक उपयोगाधिकारी का संप्रयोज्य जागीरदार द्वारा भूसंपत्ति का कब्जा दे दिया जाता था तो वह संप्रयोज्य जागीरदार का इच्छाधीन अभियासी माना जाता था। और वह किसी क्षण बाहर किया जा सकता था। धृष्टता किए जाने पर उस पर संप्रयोज्य जागीरदार द्वारा अतिचार के लिए वाद लाया जा सकता था।
- उपयोगार्थ जागीरदाता (फियाफर) की रक्षा के लिए चांसरी न्यायालय द्वारा सुलभ उपचार प्रकृति को स्पष्ट रूप से समझ लेना चाहिएः-
(i) चांसलर (न्यायाधीश) स्वयं भू संपत्ति के विरुद्ध प्रत्यक्षतः कार्यवाही करके सामान्य विधि न्यायालय की अधिकारिता में हस्तक्षेप नहीं कर सकता था, क्योंकि हस्तांतरण द्वारा संप्रयोज्य जागीरदार में भूसंपत्ति का पूर्ण हक निहित रहता था। चांसलर इस तथ्य को अनदेखा नहीं कर सकता था कि फियाफीमेंट नामक सामान्य विधिक हस्तांतरण के फलस्वरूप जिसके द्वारा भूसंपत्ति हस्तांतरित की गई थी सामान्य विधि में उसका पूर्ण स्वामी है।
(ii) चांसलर ने सुस्पष्टतः इस तथ्य को मान्य कर दिया कि फियोफी संप्रयोज्य जागीरदार भूसंपत्ति का मालिक है और उसे उसका विधिक अधिकार प्राप्त है किंतु उसने संप्रयोज्य जागीरदार से जो कुछ कहा वह इस प्रकार थाः-
फ्आपका विधिक अधिकार है मैं उसको आप से नहीं लूंगा, किंतु मैं आपको उस विधिक अधिकार को इस प्रकार करने नहीं दूंगा कि उससे वह प्रतिपत्ति जिस पर जागीरकर्ता ने संप्रयोज्य जागीर फियोफमेंट बनाया था, अतिलंघित हो जाए।’’
(iii) चांसरी (साम्यिक उच्च न्यायालय) ने उपयोग पर अपनी अधिकारिता ग्रहण करते हुए सामान्य विधि में स्वामी के विधिक अधिकार को अछूता और अलंघित