सामान्य विधि - Page 334

317

प्रयोजनार्थ ‘द’ को हस्तांतरित कर देता है। ‘ब’ वापस आता है और संपत्ति का दावा करता है। ‘द’ का विधिक हक में त्रुटि होने के कारण समाप्त हो जाता है।

‘स’ की पत्नी ‘ई’ की साम्यिक संपदा भी समाप्त हो जाती है।

(iii) विधिक अधिकार एवं साम्यिक अधिकार के बीच तीसरा अंतर यह है कि विधिक अधिकार सर्व अधिकार या व्यक्ति (personom) अधिकार भी हो सकता है। किंतु साम्यिक अधिकार हमेशा व्यक्तिगत अधिकार होता है। साम्यिक मालिक के अधिकारों को सम्मान देने के लिए कौन बाध्य है? केवल विधिक मालिक ही अन्य कोई नहीं।

यह सत्य है कि विधिक स्वामी जो बाध्य है, विधिक स्वामी नहीं है जिसके विरुद्ध साम्यिक अधिकार प्रथम उद्भूत हुआ था वरन् प्रत्येक विधिक स्वामी को शामिल करता है जिसको अधिकार अंतरित किया जाता है। तथापि प्रतिपादन यह है कि साम्यिक अधिकार व्यक्तिपरक अधिकार है जो केवल विधिक स्वामी को बाध्य करता है।

दृष्टांत - फ्साम्यिक अधिकार में सर्वबंधी अधिकार की अनुरूपता होती है।य्

(i) यह सत्य है कि साम्यिक अधिकार सर्वबंधी अधिकार के अनुरूप होता है।

(ii) यह अनुरूपता कैसे उद्भूत होती है?

  1. साम्यिक अधिकार न केवल विधिक अधिकार के स्वामी के विरुद्ध पूर्ववर्तित किया जाएगा वरन् यह निम्नलिखित के विरुद्ध भी पूर्ववर्तित किया जाएगाः-

(अ) उसके माध्यम से या उसके अधीन दावा करने वाले उसके प्रतिनिधि और स्वयं सेवक।

(ब) वे व्यक्ति जो विधिक अधिकार रखते हैं।

(1) विधिक अधिकार की जानकारी के साथ

(2) उनके विरुद्ध जो जानकारी प्राप्त कर सकते थे, अर्जित करते हैं।

(3) चांसरी न्यायालय द्वारा निर्धारित जानकारी का मानदंड इतना ऊंचा था कि कोई भी बच नहीं सकता था और हर एक क्रेता आबद्ध रहता था।

साम्यिक प्राथमिकताएं

  1. साम्यिक अधिकार एक व्यक्तिबंधी अधिकार है - एक विधिक अधिकार, जिसमें से यह निर्गित होता है, के स्वामी के विरुद्ध प्रवर्तित होने वाला।

  2. एक विधिक अधिकार से दो साम्यिक अधिकार निर्गत हो सकतं है। दोनों विधिक अधिकार, जिसमें से वे निर्गत होते हैं, के स्वामी के विरुद्ध व्यक्ति संबंधी अधिकार होंगे।