सामान्य विधि - Page 335

318 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर सम्पूर्ण वाघ्मय

  1. विधिक (अधिकार) न कि संपत्ति, जो विधिक अधिकार की विषय-वस्तु है से उद्भूत होने वाला, एक साम्यिक अधिकार, व्यक्तिबंधी, अधिकार होते हुए एक विधिक अधिकार से उसके नए स्वामी को हस्तांतरित किए जाने से विफल हो जाएगा या एक अन्य साम्यिक अधिकार, इस अंतरण से उद्भूत हो सकता है, जो पूर्ववर्ती साम्यिक अधिकार को विफल कर सकता है।

  2. विचारणीय प्रश्न है कि किन वादों में इस प्रकार का अंतरण एक साम्यिक अधिकार को विफल कर सकता है?

  3. इस विषय का विवेचन सामान्यतः फ्साम्यिक प्राथमिकताएंय् शीर्षक के अंतर्गत किया जाता है। यह इस प्रकार पदानिहित इसलिए किया जाता है क्योंकि इस मुद्दे को तय करने के लिए प्रयुक्त कसौटी समय की प्राथमिकता है। किंतु वास्तविक विषय-वस्तु है वे संभव मामले जहां साम्यिक अधिकार उस विधिक अधिकार, जिसमें से वह उद्भूत होता है, के अंतरण द्वारा या उसी विधिक अधिकार में से सृजित एक दूसरे साम्यिक अधिकार के द्वारा विफल किया जा सकता है।

  4. विचारार्थ उत्पन्न होने वाले अमल दो वर्गों के अंतर्गत आते हैंः-

(प) वे मामले जहां विधिक अधिकार एवं साम्यिक अधिकार के बीच टकराव है।

(ii) वे मामले जहां दो साम्यिक अधिकारों के बीच टकराव है।

  1. प्रथमवर्गीय मामलों में दो आकस्मिकताएं हो सकती हैं जो निश्चित प्रियेदित किया जाना चाहिएः-

(क) जहां एक साम्यिक अधिकार, विधिक अधिकार से पहले अस्तित्वशील है।

(ख) जहां एक साम्यिक अधिकार विधिक अधिकार से बाद में उद्भूत होता है। श्रीमती थार्नडिके एक निश्चित न्यासनिधि की हिताधिकारी थीं

(ग) जिसका न्यासी था। श्रीमती थार्नडिके एक वाद में न्यायालय ने ट्रस्टी को थार्नडिके के प्रयोजनों के लिए निधि को न्यायालय में अंतरित करने का निदेश दिया और न्यास एक प्रशासक के द्वारा धारित था। यह प्रतीत होता है कि न्यासीगण ने जिनके विरुद्ध आदेश किया था, अनुचित रूप से न्यासनिधि को न्यायालय में लाने के अपने व्यक्तिगत दायित्व से स्वयं को उन्मुक्त करने वाले साधन उपलब्ध कर लिए थे और यह कि तीसरे व्यक्ति थे जिनको उन्होंने क्षति पहुंचाई थी। इस प्रकार क्षतिग्रस्त तीसरे पक्ष ने वाद फाइल किया और प्रार्थना की कि थार्नडिके के नाम से धृत निधि उनको अंतरित की जानी चाहिए। दलीलः श्रीमती थार्नडिके को विधिक अधिकार नहीं है, इसलिए उसका अधिकार अधिभावी नहीं रह सकता था। दलील नामंजूर अभिनिर्धारित व्यक्तिशः विधिक हक अर्जित किया जाना आवश्यक नहीं। सूचना (नोटिस) भी आवश्यक नहीं।